भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ४९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्रिफलायाः कषायेण वटिकां कारयेद्भिषक् । एकैकां भक्षयेत्प्रातस्तक्रञ्चापि पिबेदनु ॥ ६ ॥ हन्ति शूलं पार्श्वशूलं कुक्षिबस्तिगुदे रुजम् । श्वासं कासं तथा कुष्ठं ग्रहणीदोषनाशिनी ॥ ७ ॥ निसोथकी जड़, नागरमोथा, त्रिफला और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले, पारा और गंधक प्रत्येक दो दो तोले, लोहा- भस्म, अभ्रकभस्म और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि आठ आठ तोले इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर त्रिफलेके क्वाथमें मर्दन करके गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खावे और ऊपरसे तक्रको पीवे । इससे शूल, पार्श्वशूल, कुक्षि, वस्ति और गुदज- शूल, श्वास, खाँसी, कुष्ठ और संग्रहणी रोग नष्ट होते हैं । इसको पानीयभक्त वटिका कहते हैं ॥ ४-७ ॥ क्षुधावती गुटिका । आशुभक्तोदकैः पिष्टमभ्रकं तत्र संस्थितम् । कन्दमाणास्थिसंहारखण्डकर्णरसैरथ ॥ ८ ॥ तण्डुलीयकशालिञ्चकालमारिषजेन च । वृश्चीरबृहतीभृङ्गलक्ष्मणाकेशराजकैः ॥ ९ ॥ पेषणं भावनं कुर्यात्पुटञ्चानेकशो भिषक् । यावन्निश्चन्द्रकं तत्स्याच्छुद्धिरेवं विहायसः ॥ १० ॥ स्वर्णमाक्षिकशालिञ्चे ध्मातं निर्व्वापितं जले । त्रैफलेऽथ विचूर्ण्यैवं लौहं कान्तादिकं पुनः ॥११॥ बृहत्पत्रकरीकर्णत्रिफलावृद्धदारजैः । माणकन्दास्थिसंहारशृङ्गवेरभवै रसैः ॥ १२ ॥