रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 524, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आदिमें, भोजनके अन्तमें घी और सहतके साथ इस औषधिको यथोक्तमात्रासे सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल तथा नारियलका जल पान करे । इसपर दूध और मांसादि पदार्थोंका यथेष्ट भोजन करे । इसके सेवन करनेसे अम्लपित्त, मलमूत्रका विबन्ध और मंदाग्निजनित समस्त रोग नष्ट होते हैं । बल और पुष्टिकी वृद्धि होती है । शूल, बवासीर, बीस प्रकारके प्रमेह, मूत्राघात और अश्मरीरोग नष्ट होते हैं । इस अविपत्तिकर चूर्णको अगस्त्य मुनिने कहा है ॥ ३२-३८ ॥ इति अम्लपित्ताधिकार सम्पूर्ण । अथ विसर्प-विस्फोट-तन्तुक-रोगचिकित्सा । कालाग्निरुद्ररस । सूताभ्रकान्तलौहानां भस्मगन्धकमाक्षिकम् । वन्यकर्कोटकद्रावैस्तुल्यं मर्द्यं दिनावधि ॥ १ ॥ वन्यकर्कोटिकाकन्दे क्षिप्त्वा लिप्त्वा मृदा बहिः । भूधराख्ये पुटे पश्चाद्दिनैकं तद्विपाचयेत् ॥ २ ॥ दशमाषं विषं योज्य माषमात्रन्तु भक्षयेत् । रसः कालाग्निरुद्रोऽयं दशाहेन विसर्पनुत् ॥ पिप्पलीमधुसंयुक्तमनुपानं प्रकल्पयेत् ॥ ३ ॥ शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म, कान्तलोहभस्म, गंधक और सोनामाखी- भस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर वनककोड़ेकी जड़के रसमें एक दिनतक खरल करके वनककोड़ेकी जड़के कल्कमें इस औषधिको रखे और ऊपरसे मिट्टी आदिसे लेप कर देवे । पश्चात् भूधर यंत्रमें इसको पकाकर समस्त औषधियोंका दशवां भाग विष मिलाकर एक मासे परिमाण लेकर पीपलके चूर्ण और सहतमें मिलाकर सेवन करे तो दश दिनमें विसर्परोग दूर हो जाता है । इसको कालाग्नि रुद्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥