भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

भाषाटीकासहित । ( ५०३ ) अथ कर्णरोगाधिकार । कफकेतु रस । व्योषहिज्जलबीजञ्च शंखभस्म विषान्वितम् । मरिचं सदृशं खादेत्कफकेतुमहारसम् ॥ १ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल, हिज्जलबीज, शंखकी भस्म, विष इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर कालीमिर्च बराबर सेवन करनेसे कर्णरोग नष्ट होता है। इसको कफकेतु रस कहते हैं॥१॥ सूतं गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं सकपर्दकम् । मरिचेन समायुक्तमार्ड्रतोयेन भावितम् ॥ २ ॥ वह्निमान्द्यञ्चामरोगं श्लेष्माणं ग्रहणीगदम् । सन्निपातं तथा शोथं हन्ति श्रोत्रोद्भवं गदम् ॥ ३ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, कौड़ीकी भस्म और कालीमिरच इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें सातवार भावना देकर उपयुक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि, आमरोग, श्लेष्मा, संग्रहणी, सन्निपात, शोथ और कर्णगत अनेक रोग नष्ट होते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ योगवाहिरसाः सर्वे प्रयोक्तव्या भिषग्वरैः । कर्णरोगेषु सर्वेषु पीनसादिषु नित्यशः ॥ ४ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कर्णरोगाधिकारः । बुद्धिमान् वैद्य समस्त योगवाही रसोंको यथायोग्य अनुपानोंके साथ कर्णरोगमें प्रयुक्त करे । तथा पीनसा दिरोगोंमें भी प्रयोग करे ॥ ४ ॥ इति कर्णरोगचिकित्सा समाप्त ।