भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 505

भाषाटीकासहित । (४७९) चक्रमर्दादि लेप । चक्रमर्दस्य बीजञ्च दुग्धे पिष्ट्वा विमर्दयेत् । गन्धर्वतैलसंयुक्तं मर्दनात्सर्वकुष्ठजित् ॥ ६६ ॥ पनवाड़के बीजोंको दूधमें पीसकर अरंडीके तेलमें मिलाकर कुष्ठ स्थानोंपर लेप करनेसे सब प्रकारके कुष्ठ नष्ट होते हैं ॥ ६६ ॥ लङ्केश्वर रस । भस्मसूताभ्रशुल्वानि गन्धं तालं शिलाजतु । अम्लवेतस्य तुल्यांशं त्र्यहं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥६७॥ मध्वाज्याभ्यां वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जां भक्षयेत्सदा । कुष्ठं हन्ति गजं सिंहो रसो लंकेश्वरो महान् ॥ ६८ ॥ त्रिफलानिम्बमञ्जिष्ठावचापाटलमूलकम् । कटुकारजनीक्वाथं चानुपानं प्रयोजयेत् ॥ ६९ ॥ रससिन्दूर या पारदभस्म, अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, गंधक, हरि- ताल और शिलाजीत तथा अमलवेत इन सब औषधियोंको बराबर भाग लेकर घृत और शहदमें तीन दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करे । बड़े बड़े हस्तियोंके समान कुष्ठको दूर करनेके लिये यह औषधि सिंहके समान है । इसके सेवन कर- नेके पीछे त्रिफला, नीमकी छाल, मँजीठ, वच, पाढलकी जड़, कुटकी और हलदीके क्वाथको पान करे। इसको लंकेश्वर रस कहते हैं ॥६७-६९॥ भूतभैरव रस । शुद्धं पञ्चदशात्रतालकमितं शुद्धञ्च यद्गन्धकः, सप्ताष्टौ नव तिन्तिडीयकफलात्काठिल्लकानां दश । सेहुण्डार्कपयोभिरेव सततं संचूर्ण्य तद्भाव्यते, रोहीतस्य जटारसेन मृदितं श्लक्ष्णं ततः खल्लितम् ७०