रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एकीकृत्य समस्तमेतदपि तद्वैकमेतज्जयेत्, पश्चाद्वासविशुद्धवारिसहितं किञ्चिच्च तत्पीयते । ताम्बूलं शशिखण्डमण्डितवटीमिश्रं ततः स्वापये- च्छय्यायां शुभकर्मधर्मसहितः कर्माणि सम्पादयेत् ७१ शुद्ध हरिताल १५ भाग, शुद्ध गन्धक १५ भाग, नवीन इमली ९ भाग और कैथ १० भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थूह- रके दूध और आकके दूधमें अलग अलग खरल करके भावना देवे । फिर उसे रोहिड़ेकी जड़के क्वाथमें मर्दन करके सबको एकत्र खरलकर वस्त्रसे छानकर रख लेवे और वस्त्रसे छने हुए स्वच्छ जलके साथ इस औषधिको यथायोग्य मात्रासे सेवन करे। इस औषाधिके भक्षण करनेके पश्चात् कपूर मिलाकर पान खाय और बिछाई हुई उत्तम शय्यापर शयन करे और शुद्ध धर्म कर्म सेवन करे ॥ ७० ॥ ७१ ॥ देहं वीक्ष्य सुखं मुखं न विरसं विज्ञाय सम्यक् सुधी- श्छागीदुग्धमिहैतदेवमुदितं तक्रञ्च तत्पाययेत् । नित्यं शान्तमिदं करोति नियतं सर्वौषधैर्वर्जितं, सामग्रामसमग्रमग्रिमतरं नीलञ्च पीतारुणम् ॥७२॥ श्वेतं स्फीतमनल्पकं भृशमतिप्रायः क्रिमिव्याकुलं, गन्धालिप्रमितं स्फटीकसदृशं कुष्ठञ्च चोत्साधनम् । कुष्ठाष्टादश भूतभैरव इति ख्यातः क्षितौ हन्ति च, वातव्याधिनिकृन्तनः कफकृतान्कुष्ठान्विशेषानयम्॥ हन्तीति ज्वरमुग्ररूपमधिकं दाहाभिधानामयं, कुर्याद्रूपमनङ्गरङ्गगुणभृद्भृङ्गास्पदं विग्रहम् ॥ ७३ ॥ तथा देहबलादि देखकर बकरीका दूध और तक्रादि सेवन करे । इसके सेवनसे सब प्रकारके बढ़े हुए नील, पीत, रक्त, श्वेत आदि कुष्ठ