भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 584 में से

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भाषाटीकासहित । ( ४६९ ) तांबेकी भस्म ३ पल, पारा १ पल, गंधक २ पल, त्रिकुटा ३ पल और त्रिफला ३ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हा- लूके पत्तोंके रस, अदरखके रस और चित्रककी जड़के रसमें खरल करके सूर्यकी धूपमें एक दिन सुखाकर मूषामें रखे, पश्चात् तुषोंकी अग्निमें मूषाको रखकर पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब बारीक पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर उस चूर्णको बावचीके तेलमें खरल करके उसी तेलमें ३ दिन भावना देवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे औषधि सेवन करनेसे अवश्य कुष्ठ रोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् करंजके तेलमें पिसी हुई चित्रककी जड़, गन्धक और सेंधानमक अथवा बावचीके कल्कको भक्षण करे। इसको चन्द्रकान्त रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥ सङ्कोच रस । मृतताम्राभ्रकं तुल्यं तयोः सूतश्चतुर्गुणम् । शुद्धं तन्मर्दयेत्खल्ले गोलकं कारयेत्ततः ॥ २१ ॥ त्रिभिस्तुल्यं शुद्धगन्धं लोहपात्रे क्षणं पचेत् । तन्मध्ये गोलकं पाच्यं यावज्जीर्णं तु गन्धकम्॥२२॥ एतन्मृद्वग्निना तावत्समुद्धृत्य विचूर्णयेत् । गुग्गुलुंनिम्बपञ्चाङ्गं त्रिफला चामृता विषम् ॥ २३ ॥ पटोलं खादिरं सारं व्याधिघातं समं समम् । चूर्णितं मधुना लेह्यं निष्कमौदुम्बरापहम् ॥ रसः संकोचनामायं कुष्ठे परमदुर्लभः ॥ २४ ॥ तांबेकी भस्म १ भाग, अभ्रककी भस्म १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर उसमें दश भाग गन्धक मिलाकर लोहेके पात्रमें डालकर पकावे । जबतक गन्धक जीर्ण न होजाय तबतक इसको मन्द मन्द अग्निसे

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