भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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पृष्ठ 494

( ४६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गंधक, पारा, सुहागा, तांबाभस्म, लोहभस्म और पीपल इन सबको समान भाग लेकर नींवके पञ्चांगके रसमें सात वार, त्रिफलेके रसमें सात वार और अमलतासके क्वाथमें सात वार भावना देकर चार चार रत्ती परिमाण औषधिका कुष्ठरोग और अन्यान्य समस्त रोगोंमें प्रयोग करे । इसको कुष्ठकालानल रस कहते हैं ॥ १४ ॥ वज्रवटी । शुद्धसूताग्निमरिचं सूताद्द्विगुणगन्धकम् । काठोडुम्बरिकाक्षीरैर्दिनं मर्द्यं प्रयत्नतः ॥ १५ ॥ वराव्योषकषायेण वटीञ्चास्य समाचरेत् । लिह्याद्वज्रवटी ह्येषा पामारोगविनाशिनी ॥ १६ ॥ शुद्ध पारा और चित्रककी जड़, मरिच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, गंधक २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके कठूमरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । पश्चात् त्रिफला और त्रिकुटेके क्वाथमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पामा रोग नष्ट होता है । इसको वज्रवटी कहते हैं ॥१५॥१६॥ चन्द्रकान्त रस । पलत्रयं मृतं ताम्रं सूतमेकं द्विगन्धकम् । त्रिकटुत्रिफलाचूर्णं प्रत्येकञ्च पलं पलम् ॥ १७ ॥ निर्गुण्ड्याश्चार्द्रकद्रावैर्वह्निद्रावैर्विमर्दयेत् । दिनैकं तद्विशोष्याथ तुषाग्नौ स्वेदयेद्दिनम् ॥ १८ ॥ समुद्धृत्य विचूर्ण्याथ वागुजीतैलमर्दितम् । त्रिदिनं भावयेत्तेन निष्कैकं भक्षयेत्सदा ॥ १९ ॥ चन्द्रकान्तरसो नाम्ना कुष्ठं हन्ति न संशयः । तैलं करञ्जबीजोत्थं वह्निगन्धकसैन्धवैः ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं कल्कं वा वागुजीभवम् ॥ २० ॥