भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

भाषाटीकासहित । ( ४६७ ) द्विनिष्कं भक्षणाद्धन्ति प्रसुतिकुष्ठमण्डलम् । पातालगरुडीमूलं जलैः पिष्ट्वा पिबेदनु ॥ ११ ॥ मूर्च्छित पारा १ भाग, गंधक, चित्रककी जड़, बावचीके बीज और ढाकके बीज यह प्रत्येक द्वादश ( बारह १२ ) भाग और पुराना गुड़ ३० भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र सहतमें पीसकर आठ आठ मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ब्रह्म- हत्यादिजन्य प्रसुतिरोग और मण्डल कुष्ठ नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके बाद पातालगरुडी (छिरहिंटा) की जड़को जलमें पीसकर सेवन करे । इसको ब्रह्मरस कहते हैं ॥ ९-११ ॥ चन्द्रानन रस । सूतव्योमाग्नयस्तुल्यास्त्रिभागो गन्धकस्य च । काठोडुम्बरिकाक्षीरैः सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ १२ ॥ माषमात्रां गुटीं कृत्वा कुष्ठरोगे प्रयोजयेत् । देहशुद्धिं पुरा कृत्वा सर्वकुष्ठानि नाशयेत् ॥ एष चन्द्राननो नाम साक्षाच्छ्रीभैरवोदितः ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म और चित्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गन्धक ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कठूमरके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । प्रथम वमन और विरेचनके द्वारा शरीरको शुद्ध करके कुष्ठरोगमें इस औषधिका प्रयोग करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । इस चन्द्रानन रसको श्रीभैरवजीने कहा है ॥ १२ ॥ १३ ॥ कुष्ठकालानल रस । गन्धं रसं टङ्कणताम्रलोहं भस्मीकृतं मागधिकासमेतम् । पञ्चाङ्गनिम्बेन फलत्रिकेन विभावितं राजतरोस्तथैव ॥ नियोजयेद्वल्लकयुग्ममानं कुष्ठेषु सर्वेषु च रोगसंघे १४॥