रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उदयभास्कर । गन्धकेन मृतं ताम्रं दशभागं समुद्धरेत् । ऊषणं पञ्चभागं स्यादमृतञ्च द्विभागिकम् ॥ ५ ॥ सूक्ष्मचूर्णीकृतं सर्वं रक्तिकैकप्रमाणतः । दातव्यं कुष्ठिने सम्यगनुपानस्य योगतः ॥ ६ ॥ गलिते स्फुटिते चैव विषूच्यां मण्डले तथा । विचर्चिकादद्रुपामाकुष्ठरोगप्रशान्तये ॥ ७ ॥ गंधकसे मारा हुआ तांबा १० भाग, काली मिरच ५ भाग, विष २ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको यथोचित अनुपानके साथ कुष्ठरोगीको देवे । गला हुआ और फूटा हुआ ऐसे कुष्ठरोगमें, विषू- चिकामें, मण्डलरोगमें और विचर्चिका, दद्रु, पामा इत्यादि कुष्ठ रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करे । इसको उदयभास्कर रस कहते हैं॥५-७॥ तालकेश्वर रस । धात्रीटंकणतालानां दशभागं समुद्धरेत् । धात्र्या रसैर्मर्दयित्वा शिखरीमूलवारिणा ॥ सर्वकुष्ठहरः सेव्यः सर्वदा भोजनप्रियः ॥ ८ ॥ आमला, सुहागा और हरिताल यह प्रत्येक औषधि दश तोले लेकर सबको एकत्र पीसकर आमले और चिरचिटेके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कुष्ठ रोग नष्ट होता है ॥८॥ ब्रह्म रस । भागैकं मूर्च्छितं सूतं गन्धकं त्वथवागुजी । चूर्णन्तु ब्रह्मबीजानां प्रतिद्वादशभागिकम् ॥ ९ ॥ त्रिंशद्भागं गुडस्यापि क्षौद्रेण गुटिका कृता । अयं ब्रह्मरसो नाम्ना ब्रह्महत्यादिनाशनः ॥ १० ॥