भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (५११) लोहा, तांबा, हरिताल, वंग, अभ्रक, कौड़ी इन सबकी भस्म, त्रिकुटा, त्रिफला, चित्रककी जड़, वायविडंग, पांचों लवण, चव्य, पीपल, शंखनाभि, वच, हाऊबेर, कूठ, कचूर, पाठ, देवदारु, इलायची और विधारेके बीज इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको सहत, मिश्री और घृतमें मिलाकर सेवन करे। इस औषधिके सेवन करनेसे रक्त, श्वेत, पीत और नीले रंगका प्रदर, कुक्षिशूल, कटिशूल, योनिशूल, सर्वांग- गतशूल, मन्दाग्नि, अरुचि, पांडु, कष्टसाध्य श्वास और कासरोग नष्ट होते हैं तथा आयु, पुष्टि, बल और वर्णकी वृद्धि होती है ॥ १-५ ॥ प्रदरान्तक रस । शुद्धसूतं तथा गन्धं गन्धतुल्यञ्च रूप्यकम् । खर्परञ्च वराटञ्च शाणमानं पृथक्पृथक् ॥ ६ ॥ तृतीयं तोलकं चैव लोहचूर्णं क्षिपेत्सुधीः । कन्यानीरेणैकदिनं मर्दयेच्च भिषग्वरः ॥ असाध्यं प्रदरं हन्ति भक्षणान्नात्र संशयः ॥ ७ ॥ शुद्धपारा, गंधक, रूपाभस्म, खपरियाभस्म और कौड़ी यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे और लोहभस्मका चूर्ण ३ तोले लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घीक्वारके रसमें एक दिन तक खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे असाध्य प्रदर रोग नष्ट होता है ॥ ६ ॥ ७ ॥ मधुयष्टिनिशाचूर्णं तोलकेन समन्वितम् । वङ्गभस्मार्कपत्रस्य रसेनाप्लाव्य पीयते ॥ प्रातःप्रातः प्रतिदिनं प्रदरं हन्ति दुस्तरम् ॥ ८ ॥ मुलैठीका चूर्ण, हल्दीका चूर्ण और वंगकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोले परिमाण लेकर आकके पत्तोंके रसमें खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल भक्षण करे तो दुर्जय प्रदररोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥