रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (५१३) प्रयोग किया जाता है वह सब रोग नष्ट होजाते हैं । देश और कालको विचार कर इसके अनुपानकी कल्पना करे । इससे सर्व उप- द्रवयुक्त त्रिदोषज प्रदर, द्विदोषज प्रदर, बहुत दिनोंका प्रदर, रक्तपित्त, खाँसी, श्वास, अम्लपित्त, क्षय और सब प्रकारके प्रदररोग दूर होते हैं । बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । इस औषधिका सर्व प्रका- रके रोगोंमें प्रयोग करे । इसको पुष्करलेह कहते हैं ॥ ९-१५ ॥ धात्री च पथ्या च रसाञ्जनञ्च विचूर्ण्य सर्वं सजलंनिपीतम् अनन्तरक्तस्रवमुग्रवेगं निवारयेत्सेतुरिवाम्बुवेगम् ॥१६॥ आमले, हरड़ और रसौत इन ताना औषधियोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर पान करे तो अत्यंत बहता हुआ भी प्रदररोग दूर होता है १६ रक्तपित्तहरं सर्वं प्रदरे नूतने तथा । रक्तातिसारे कथितं सर्वमेतत्प्रयोजयेत् ॥ १७ ॥ इति प्रदरचिकित्सा । नवीन प्रदररोगमें सर्व रक्तपित्तनाशक और रक्तातिसारोक्त चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १७ ॥ इति प्रदरचिकित्सा समाप्त । अथ योनिव्यापच्चिकित्सा । समस्तं वातजित्कर्म योनिव्यापत्सु शस्यते । क्षालनस्वेदलेपांश्च वरानीरेण कारयेत् ॥ १ ॥ प्रक्षालयेद्भगं नित्यं पथ्यामलकवल्कलैः । वृद्धापि कामिनी क्वापि बालावत्कुरुते रतिम् ॥ २ ॥ इति योनिव्यापच्चिकित्सा । योनिव्यापतरोगमें समस्त वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । त्रिफलेके काथसे योनिको धोवे, स्वेद देवे और लेपन कर्म करे । प्रति- दिन हरड़ और आमलोंके काथसे योनिको धोवे तो वृद्धा स्त्री भी बालाकी समान रति करती है ॥ १ ॥ २ ॥ इति योनिव्यापच्चिकित्सा ।