रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ सूतिकारोगचिकित्सा । सूतिकारि रस । रसगन्धककृष्णाभ्रं तदर्द्धं मृतताम्रकम् । चूर्णितं मर्दयेद्यत्नान्मण्डूकपर्णीरसेन च ॥ १ ॥ छायाशुष्का वटी कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । क्षीरत्रिकटुना युक्ता सूतिकातङ्कनाशिनी ॥ ज्वरं तृष्णां रुचिं श्वासं शोथं हन्ति न संशयः ॥२॥ पारा, गन्धक और कृष्णाभ्रकभस्म यह प्रत्येक एक एक भाग, तांबाभस्म आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर मण्डूक- पर्णीके रसमें मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे + दूध और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सूतिकारोग, ज्वर, तृषा, अरुचि, श्वास और शोथरोग दूर होते हैं ॥ १॥२॥ सूतिकाविनोद रस । रसगन्धकतुत्थञ्च त्र्यहं जम्बीरमर्दितम् । त्रिभावितं त्रिकटुना देयं गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ गर्भिण्याः शूलविष्टम्भज्वराजीर्णेषु योजयेत्॥ ३ ॥ पारा, गन्धक, तूतिया इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करके त्रिकुटेके क्वाथमें तीन भावना देवे । इसकी चार चार रत्तीकी गोली गर्भवती स्त्रीको सेवन करावे तो शूल, विष्टम्भ, ज्वर और अजीर्णरोग दूर होते हैं । इसको सूतिकाविनोद रस कहते हैं ॥ ३ ॥ गर्भचिन्तामणि रस । तुत्थस्थाने हेम देयं चिन्तामणिरसे तथा ॥ ४ ॥ इस सूतिकाविनोद रसमें तूतियाकी जगह जो सोना मिला लिया जाय तो गर्भचिन्तामणि रस तैयार होता है ॥ ४ ॥