रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( ५१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ सूतिकारोगचिकित्सा । सूतिकारि रस । रसगन्धककृष्णाभ्रं तदर्द्धं मृतताम्रकम् । चूर्णितं मर्दयेद्यत्नान्मण्डूकपर्णीरसेन च ॥ १ ॥ छायाशुष्का वटी कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । क्षीरत्रिकटुना युक्ता सूतिकातङ्कनाशिनी ॥ ज्वरं तृष्णां रुचिं श्वासं शोथं हन्ति न संशयः ॥२॥ पारा, गन्धक और कृष्णाभ्रकभस्म यह प्रत्येक एक एक भाग, तांबाभस्म आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर मण्डूक- पर्णीके रसमें मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे + दूध और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सूतिकारोग, ज्वर, तृषा, अरुचि, श्वास और शोथरोग दूर होते हैं ॥ १॥२॥ सूतिकाविनोद रस । रसगन्धकतुत्थञ्च त्र्यहं जम्बीरमर्दितम् । त्रिभावितं त्रिकटुना देयं गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ गर्भिण्याः शूलविष्टम्भज्वराजीर्णेषु योजयेत्॥ ३ ॥ पारा, गन्धक, तूतिया इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करके त्रिकुटेके क्वाथमें तीन भावना देवे । इसकी चार चार रत्तीकी गोली गर्भवती स्त्रीको सेवन करावे तो शूल, विष्टम्भ, ज्वर और अजीर्णरोग दूर होते हैं । इसको सूतिकाविनोद रस कहते हैं ॥ ३ ॥ गर्भचिन्तामणि रस । तुत्थस्थाने हेम देयं चिन्तामणिरसे तथा ॥ ४ ॥ इस सूतिकाविनोद रसमें तूतियाकी जगह जो सोना मिला लिया जाय तो गर्भचिन्तामणि रस तैयार होता है ॥ ४ ॥
भाषाटीकासहित । (५१५) बृहत्सूतिकाविनोद रस। शुण्ठ्या भागो भवेदेको द्वौ भागौ मरिचस्य च । पिप्पल्याश्च त्रिभागं स्यादर्द्धभागश्च व्योमकम् ॥५॥ जातीकोषस्य भागौ द्वौ द्वौ भागौ तुत्थकस्य च । सिन्धुवारजलेनैव मर्दयेदेकयामतः ॥ मधुना सह भोक्तव्यः सूतिकातङ्कनाशनः ॥ ६ ॥ सोंठ १ भाग, मरिच २ भाग, पीपल ३ भाग, अभ्रकभस्म आधा भाग, जायफल २ भाग और तूतिया २ भाग लेवे । इन सब औष- धियोंको एकत्र पीसकर सम्हालूके पत्तोंके रसमें एक प्रहरतक खरल करके सहतके साथ भक्षण करे तो सूतिकारोग नष्ट होता है । इसको बृहत्सूतिकाविनोद रस कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ सूतिकारि रस । टङ्गणं मूर्च्छितं सूतं गन्धकं हेम तारकम् । जातीफलं तथा कोषं लवङ्गैला च धातकी ॥ ७ ॥ वत्सकेन्द्रयवं पाठा शृङ्गीविश्वाजमोदिका । गुटी प्रसारिणीरसैश्चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ॥ ८ ॥ भावयेत्तद्रसैः प्रातः सूतिकातङ्कशान्तये । जीर्णज्वरं तथा शोथं ग्रहणीप्लीहकासनुत् ॥ ९ ॥ सुहागा, रससिन्दूर, गंधक, सोनाभस्म, चांदीभस्म, जायफल, जावित्री, लौंग, इलायची, धायके फूल, कुड़ेकी छाल, इन्द्रजौ, पाठ, काकड़ासिंगी, सोंठ और अजवायन इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर प्रसारणीके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल प्रसारणीके रसके साथ एक गोली खाय तो अवश्य प्रसूताके रोग नष्ट होते हैं । इससे जीर्णज्वर, शोथ, संग्रहणी, प्लीहा और कासरोग नष्ट होते हैं ॥ ७-९ ॥
( ५१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सूतिकाघ्न रस । रसगन्धकलौहाभ्र जातीकोषं सुवर्चलम् । समांशं मर्दयेत्खल्ले छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ १० ॥ गुञ्जाद्वयप्रमाणेन सूतिकातंकनाशनः । ज्वरातीसाररोगघ्नः सूतिकासुखदायकः ॥ सूतिकाघ्नो रसो नाम ब्रह्मणा परिकीर्त्तितः ॥ ११ ॥ पारा, गंधक, लोहा, अभ्रकभस्म, जायफल और कालानमक यह सब औषधि समान भाग लेकर बकरीके दूधमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे ज्वर, अतिसार और सूतिकारोग नष्ट होते हैं । इसको स्वयं ब्रह्मदेवने कहा है ॥ १० ॥ ११ ॥ सूतिकान्तक रस । रसाभ्रगन्धकव्योषं सुवर्णमाक्षिकं विषम् । सर्वमेकीकृतं चूर्णं खादेद्रक्तिचतुष्टयम् ॥ १२ ॥ सूतिकाग्रहणीरोगं वह्निमान्द्यञ्च नाशयेत् । अतिसारञ्च शमयेदपि वैद्यविवर्जितम् ॥ कासश्वासातिसारघ्नो वाजीकरण उत्तमः ॥ १३ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, गंधक, त्रिकुटा, सोनामाखीभस्म और विष यह सब औषधि समान भाग लेकर इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सूतिकारोग, संग्रहणी, मंदाग्नि, वैद्यों करके त्यागा हुआ अतिसार, श्वास, खाँसी और अतिसार रोग नष्ट होते हैं और यह उत्तम वाजीकरण है ॥ १२ ॥ १३ ॥ गर्भचिन्तामणि रस । जातीफलं टंकणञ्च व्योषं दैत्येन्द्ररक्तकम् । तच्चूर्णं समभागेन मर्दितं प्रहरद्वयम् ॥ १४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५१७) जम्बीररसयोगेन वटीं कुर्याद्विचक्षणः । गुञ्जाद्वयप्रमाणान्तु खलु वैद्यः प्रयत्नतः ॥ १५ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव भक्षयेदुष्णवारिणा । निहन्ति सर्वरोगांश्च भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १६ ॥ जायफल, सुहागा, त्रिकुटा और सिंग्रफ इन सब औषधियोंका चूर्ण प्रत्येक एक एक भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें दो प्रहरतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरखके रस और गरम जलके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारके स्त्रियोंके रोग ऐसे
- नष्ट होते हैं जैसे सूर्यके द्वारा अन्धकार ॥ १४-१६ ॥ दूसरा गर्भचिंतामणि रस । रसं तारं तथा लौहं प्रत्येकं कर्षमानतः । कर्षत्रयं तथा चाभ्रं कर्पूरं वङ्गताम्रकम् ॥ १७ ॥ जातीफलं तथा कोषं गोक्षुरञ्च शतावरी । बलातिबलयोर्मूलं प्रत्येकं तोलकं शुभम् ॥ १८ ॥ वारिणा वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । सन्निपातं निहन्त्याशु स्त्रीणाञ्चैव विशेषतः ॥ गर्भिण्या ज्वरदाहञ्च प्रदरं सूतिकामयम् ॥ १९ ॥ शुद्ध पारा, रूपाभस्म, लोहभस्म यह प्रत्येक एक एक कर्ष परि- माण, अभ्रकभस्म ३ कर्ष, कपूर, वंगभस्म, तांबाभस्म, जायफल, जावित्री, गोखुरू, सतावर, खिरेंटीकी जड़ और कंघीकी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सन्निपात, स्त्रीरोग, गर्भिणीज्वर, दाह, सूतिका और प्रदररोग नष्ट होते हैं ॥ १७-१९ ॥
( ५१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बृहत् गर्भचिंतामणि रस । सूतं गन्धं तथा स्वर्णं लौहं रजतमाक्षिके । हरितालं वङ्गभस्माप्यभ्रकं समभागिकम् ॥ २० ॥ भावना खलु दातव्या रसैरेषां पृथक् पृथक् । ब्राह्मीवासाभृगराजपर्पटीदशमूलकैः ॥ २१ ॥ सप्तधा भावयेद्वैद्यो गुञ्जामात्रां वटीञ्चरेत् । गर्भचिन्तामणिरयं पूर्ववद्गुणकारकः ॥ २२ ॥ पारा, गंधक, सोना, लोहा, रूपा, सोनामाखी, हरिताल, वंग और अभ्रककी भस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर ब्राह्मी, अडूसा, भांगरा, पित्तपापड़ा और दशमूलके क्वाथमें अलग अलग सात सात भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे। यह औषधि गर्भ- चिंतामणि रसकी समान हितकारी है ॥ २०–२२ ॥ गर्भविनोद रस । देयं त्रिभागं त्रिकटु चतुर्भागञ्च हिंगुलम् । जातीकोषं लवङ्गञ्च प्रत्येकं च त्रिकार्षिकम् ॥ २३ ॥ सुवर्णमाक्षिकस्यापि पलार्द्धं प्रक्षिपेद्बुधः । जलेन मर्दयित्वाथ चणमात्रा वटी कृता ॥ निहन्ति गर्भिणीरोगं भास्करस्तिमिरं यथा ॥ २४ ॥ त्रिकुटेका चूर्ण ३ कर्ष, सिंग्रफ ४ कर्ष, जावित्री और लौंग यह प्रत्येक औषधि तीन तीन कर्ष परिमाण लेवे, सोनामाखी २ तोले इन सब औष- धियोंको एकत्र जलमें पीसकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे। इस औष- धिके सेवन करनेसे गर्भिणीके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥
भाषाटीकासहित । (५१९) सूतिकाहर रस । लवङ्गं रसगन्धौ च यवक्षारं तथाऽभ्रकम् । लौहं ताम्रं सीसकञ्च पलमानं समाहरेत् ॥ २५ ॥ जातीफलं केशराजं वराभृङ्गैलमुस्तकम् । धातकीन्द्रयवं पाठा शृङ्गी बिल्वञ्च वालकम् ॥ २६ ॥ कर्षमानञ्च संचूर्ण्य सर्वमेकत्र कारयेत् । बदरास्थिप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २७ ॥ गन्धालिकापत्ररसैरनुपानं प्रदापयेत् । सर्वातीसारशमनः सर्वशूलनिवारणः ॥ सूतिकाहरनामाऽयं रसः परमदुर्ल्लभः ॥ २८ ॥ लौंग, पारा, गंधक, जवाखार, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, तांबाभस्म और सीसाभस्म यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले, जायफल, कुकुर- भांगरा, त्रिफला, भांगरा, इलायची, नागरमोथा, धायके फूल, इन्द्रजौ, पाठ, काकड़ासिंगी, बेलकी छाल और सुगंधवाला यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेकर अच्छे प्रकारसे पीसकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंको प्रसारणीके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके अतिसार और सर्व प्रकारके शूल रोग नष्ट होते हैं । इसको सूतिकाहर रस कहते हैं ॥ २५–२८ ॥ महाभ्र वटी । अभ्रकं पुटितं ताम्रं लौहं गन्धकपारदम् । कुनटी टङ्कणं क्षारं त्रिफला च पलं पलम् ॥ २९ ॥ गरलञ्च तथा माषचतुष्कञ्चैव चूर्णितम् । तत्सर्वं भावयेदेषां रसैः प्रत्येकशः पलैः ॥ ३० ॥
( ५२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ग्रीष्मसुन्दरकस्याटरूषकस्य क्रमेण तु । रसैस्ताम्बूलवल्ल्याश्च दलोत्थैर्भावितं पृथक् ॥ ३१ ॥ द्रवे किञ्चित्स्थिते चूर्णं मरिचस्य पलं क्षिपेत् । सर्वातीसारशमनं सर्वशूलनिवारणम् ॥ ३२ ॥ सूतिकाशोथपाण्डुत्वं सर्वज्वरविनाशनम् । नाशयेत्सूतिकातङ्कं वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३३ ॥ अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, गंधक, पारा, मैनशिल, सुहागा, जवाखार और त्रिफला प्रत्येक एक एक पल और विष चार मासे लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर ग्रीष्मसुन्दर (गीमा यह किसी देशकी भाषा ), अडूसेके पत्ते और पान इन प्रत्येकके एक एक पल रसके द्वारा अलग अलग भावना देवे । जब यह भीग जाय तब इसमें काली- मिरचोंका चूर्ण मिला देवे । फिर कुछ समयतक मर्दन करके यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे। इस औषधिके भक्षण करनेसे सब प्रकारका अतिसार, सब प्रकारका शूल, सूतिका रोग, शोथ, पांडु और सर्व प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । जिसप्रकार वज्रसे वृक्षोंका नाश होता है उसी प्रकार इससे सूतिकारोग नष्ट होता है ॥ २९–३३ ॥ मृतमभ्रञ्च लौहञ्च कुनटी ताम्रकं तथा । रसगन्धकटंकञ्च यवक्षारफलत्रिकम् ॥ ३४ ॥ प्रत्येकं तोलकं ग्राह्यमूषणं पञ्चतोलकम् । सर्वमेकीकृतं चूर्णं प्रत्येकेन विभावयेत् ॥ ३५ ॥ ग्रीष्मसुन्दरसिंहस्य नागवल्ल्या रसेन च । चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ योजयेत्सर्वथा वैद्यः सूतिकारोगशान्तये ॥ ३६ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५२१ ) दूसरी महाअभ्र वटी-अभ्रककी भस्म, लोहभस्म, मैनशिल, तांबा- भस्म, पारा, गंधक, सुहागा, जवाखार और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला और त्रिकुटा पांच तोले लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर चूर्ण बनाकर गीमाका शाक, अडूसा और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको सूतिकारोगको दूर करनेके लिये प्रयुक्त करे ॥ ३४-३६ ॥ रसशार्दूल रस । अभ्रं ताम्रं तथा लौहं राजपहं रसं तथा । गन्धटंकमरीचञ्च यवक्षारं समांशकम् ॥ ३७ ॥ तथाऽत्र तालकञ्चैव त्रिफलायाश्च तोलकम् । तोलकञ्चामृतञ्चैव षड्गुञ्जाप्रमिता वटी ॥ ३८ ॥ ग्रीष्मसुन्दरकस्यापि नागवल्लीरसेन च । भावयेत्सप्तधा हन्ति ज्वरकासाङ्गसंग्रहम् ॥ सूतिकातङ्कशोथादिस्त्रीरोगञ्च विनाशयेत् ॥ ३९ ॥ अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, राजपह, पारा, गंधक, सुहागा, मरिच, जवाखार, हरताल, त्रिफला और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । सबको एकत्र पीसकर गीमाके शाक और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर छः छः रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे ज्वर, खाँसी, शरीरकी पीड़ा और सूतिकादि स्त्रीरोग नष्ट होते हैं ॥ ३७-३९ ॥ महाशार्दूल रस । अभ्रकं पुटितं ताम्रं स्वर्णं गन्धञ्च पारदम् । शिला टङ्कं यवक्षारं त्रिफायाः पलं पलम् ॥ ४० ॥
(५२२) रसेन्द्रसारसंग्रह । गरलस्य तथा ग्राह्यमर्द्धतोलकसम्मितम् । त्वगेलापत्रकञ्चैव जातीकोषलवङ्गकम् ॥ ४१ ॥ मांसी तालीशपत्रञ्च माक्षिकञ्च रसाञ्जनम् । एषां द्विकार्षिकं भागं देयञ्चापि विचक्षणैः ॥ ४२ ॥ द्रवे किञ्चित्स्थिते चूर्णं मरिचस्य पलं क्षिपेत् । भावना च प्रदातव्या पूर्वोक्तेन रसेन च ॥४३॥ निहन्ति विविधान्रोगान्ज्वरान्दाहान्वमिं भ्रमम् । तथातिसारकञ्चैव वह्निमान्द्यमरोचकम् ॥ विशेषाद्गार्भिणीरोगं नाशयेदचिरेण च ॥ ४४ ॥ अभ्रक, तांबा, सोना इन सबकी भस्म, गंधक, पारा, मैनशिल, सुहागा, जवारखार और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले परिमाण, विष ६ मासे, दालचीनी, इलायची, तेजपात, जावित्री, लौंग, बालछड़, तालीशपत्र, सोनामाखीभस्म और रसौत यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष परिमाण लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गीमेका शाक और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे । जब कुछ पतला होजावे तब इसमें चार तोले कालीमिरचोंका चूर्ण डालकर गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ज्वर, दाह, वमन, भ्रम, अतिसार, मन्दाग्नि और अरुचिप्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं तथा थोड़े ही दिनोंमें गर्भवतीके समस्त रोग दूर हो जाते हैं ॥ ४०-४४ ॥ बृहद्रसशार्दूल रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं शुद्धं संमर्दयेद्दिनम् । प्रतिलौहं सूततुल्यमष्टलौहं मृतं क्षिपेत् ॥ ४५ ॥ ब्राह्मी जयन्ती निर्गुण्डी मधुयष्टिः पुनर्नवा । नलिकागिरिकर्ण्यर्ककृष्णधूर्त्तदुरालभाः ॥ ४६ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५२३ ) अटरूषं काकमाची द्रवैरेषां विमर्दयेत् । गुञ्जात्रयं चतुर्थं वा सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ रोगोक्तमनुपानं वा कवोष्णं वा जलं पिबेत् ॥ ४७ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बनावे, फिर इसमें अष्टधातुओंकी भस्म प्रत्येक एक एक भाग मिलावे। पश्चात् ब्राह्मी, जयंतीके पत्ते, सम्हालू, मुलैठी, पुनर्नवा, नाड़ीशाक, कोयल, आककी जड़, काले धतूरेके पत्ते, धमासा, अडूसा और मकोय इन प्रत्येकके रसके द्वारा पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बनावे । इन गोलियोंको यथोचित अनुपानके साथ सब रोगोंमें प्रयोग करे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें रोगोंके अनुसार अनुपान अथवा मंदोष्ण जलपान करे ॥ ४५-४७ ॥ अष्टधातु । सुवर्णं रजतं ताम्रं कांस्यं पित्तलमेव च । नागं वंगं तथा लौहं धातवोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः ॥ ४८ ॥ इति सूतिकारोगचिकित्सा । इसमें जो अष्टधातु कही हैं सो उनके नाम इस प्रकार हैं-सोना १, चांदी २, तांबा ३, कांसा ४, पित्तल ५, सीसा ६, वंग ७ और लोहा ८ यह आठ धातु जाननी ॥४८॥ इति सूतिकारोगचिकित्सा समाप्त । अथ बालरोगचिकित्सा । बालरस । पलं शुद्धस्य सूतस्य गन्धकस्य पलं तथा । सुवर्णमाक्षिकस्यापि भागार्द्धं सम्प्रकल्पयेत् ॥ १ ॥ ततः कज्जलिकां कृत्वा लौहपात्रमये दृढे । केशराजस्य भृङ्गस्य निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ॥ २ ॥ शुभे शिलामये पात्रे लौहदण्डेन मर्दयेत् । राजिकासदृशीश्चैव वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ३ ॥
( ५२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एकैकां वटिकां खादेन्नागवल्लीदलद्रवैः । हन्ति त्रिदोषसम्भूतं ज्वरञ्चैव सुदारुणम् ॥ ४ ॥ चिरज्वरञ्च कासञ्च शूलं सर्वभवं तथा । शिशूनां रोगनाशाय शिवेन परिकीर्तितः ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक यह प्रत्येक चार चार तोले और सोना- माखी २ तोले लेवे, इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर दृढ लोहेके पात्रमें कुकुरभांगरेके रसमें, भांगरेके रसमें और सम्हालूके रसमें अलग अलग भावना देकर उत्तम पत्थरके खरलमें लोहेके डंडेसे खरल करे । पश्चात् इसकी सरसोंकी बराबर गोली बना लेवे । पानके रसके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बालकोंका दारुण सन्निपातज्वर, बहुत दिनोंका पुराना ज्वर, खाँसी और त्रिदोषजशूल नष्ट होते हैं । यह बालरस नामक औषधि बालकोंके रोगोंको दूर करनेके लिये स्वयं महादेवने कही है ॥ १-५ ॥ अपर बालरस । पलं शुद्धस्य सूतस्य गन्धकस्य च तत्समम् । सुवर्णमाक्षिकस्यापि चार्द्धभागं नियोजयेत् ॥६॥ ततः कज्जलिकां कृत्वा पात्रे लौहमये दृढे । केशराजस्य भृङ्गस्य निर्गुण्ड्याः पर्णसम्भवम् ॥७॥ स्वरसं काकमाच्याश्च ग्रीष्मसुन्दरकस्य च । सूर्यावर्त्तकवर्षाभूभेकपर्णीरसैस्तथा ॥ ८ ॥ श्वेतापराजितायाश्च रसं दद्याद्विचक्षणः । देयं रसार्द्धभागेन चूर्णं मरिचसम्भवम् ॥ ९ ॥ शुभे शिलामये पात्रे यामं दण्डेन मर्दयेत् । शुष्कमातपसंयोगाद्वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ १० ॥
भाषाटीकासहित । ( ५२५ ) प्रमाणं सर्षपाकारं बालानाञ्च प्रयोजयेत् । हन्ति त्रिदोषसम्भूतं ज्वरञ्चैव सुदारुणम् ॥ कासञ्च विविधं चैव सर्वरोगं निहन्ति च ॥ ११ ॥ इति बालरोगचिकित्सा । शुद्ध पारा १ पल, गंधक १ पल और सोनामाखी २ तोले इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर लोहेके दृढ पात्रमें कुकुरभांगरा, भांगरा, सम्हालू, पान, मकोय, गीमा, हुलहुल, पुनर्नवा, मण्डूकपर्णी और श्वेत कोइल इन प्रत्येकके रसके द्वारा अलग अलग खरल करके पश्चात् पारेसे आधा भाग कालीमिरचोंका चूर्ण मिलाकर उत्तम पत्थ- रके पात्रमें एक प्रहरतक खरल करके सरसोंकी बराबर गोली बना लेवे और फिर उनको धूपमें सुखा देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बालकोंका त्रिदोषज ज्वर, विविध प्रकारका कास और सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ६-११ ॥ इति बालरोगाधिकार संपूर्ण । अथ विषाधिकार । विषवज्रपात रस । निशां सटङ्कञ्च सजातिकोषं तुत्थं समांशं कुरु देवदाल्याः । रसेन पिष्ट्वा विषवज्रपातो रसो भवेत् सर्वविषापहन्ता ॥ १ ॥ निष्कोऽस्य सञ्जीवयति प्रयुक्तो नृमूत्रयोगेन च कालदष्टम् । जटाविषेणा- कुलितं तथान्यैर्विषैर्वरञ्चाशु तथातुरं च ॥ २ ॥ हल्दी, सुहागा, जावित्री और तूतिया इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बंदालके रसमें खरल करके चार मासे परिमाण औषधि मनुष्यके मूत्रमें मिलाकर सेवन करे । सर्व प्रकारके विषोंको नष्ट करनेवाली इस औषधिके सेवन करनेसे कालदष्ट मनुष्य भी जीजाता है । मूलविष ( काष्ठविष ) से व्याकुल और अन्यान्य १८
( ५२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । खनिजपाषाण, विष ग्रन्थाति अथवा कृमिविष और सर्पादिक जंगम विषसे पीड़ित मनुष्य भी इस औषधिके प्रभावसे शीघ्र ही आरोग्य होजाता है ॥ १ ॥ २ ॥ भीमरुद्र रस । सूतराजस्य तोलैकं गन्धकस्य तथैव च । अभ्रात्कर्षं ततो देयं तोलैकं कान्तलौहकम् ॥ ३ ॥ परोक्तेनौषधेनैव भावयेच्च पृथक् पृथक् । विशाला बृहती ब्राह्मी सौगन्धिकसुदाडिमैः ॥ ४ ॥ मर्कट्याश्चात्मगुप्तायाः स्वरसेन पृथक् पृथक् । एतद्रक्तिकमानेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ५ ॥ वटीमेकां भक्षयित्वा पिबेच्छीतजलं ततः । भीमरुद्रो रसो नाम चासाध्यमपि साधयेत् ॥ कुक्कुरस्य शृगालस्य विषं हन्ति सुदुस्तरम् ॥ ६ ॥ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे उत्तरखण्डः समाप्तः ॥ २ ॥ पारा १ तोला, गंधक १ तोला, अभ्रकभस्म १ कर्ष और कान्त लोहाभस्म १ तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर, इन्द्रायनकी जड़, कटेरी, ब्राह्मी, नीलकमल, अनार, चिरचिरा और कौंच इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे। औषधिके सेवन करनेके पश्चात् शीतल जलको पीवे। इसके सेवन करनेसे असाध्य विषरोग तथा कुत्ते एवं गीदड़का अत्यंत दुस्तर विष भी दूर होता है ॥ ३–६ ॥ इति विषचिकित्सा समाप्त । दूर होहिं जिन रसनसे, ज्वर आदिक सब रोग । द्वितिय खण्डमें सो लिखे, सिद्ध सिद्ध सब योग ॥ इति पटियालाराज्यस्थवैद्यरत्नरामप्रसादराजवैद्यवैद्योपाध्यायकृत- भाषाटीकायामुत्तरखण्डः समाप्तः ॥ २ ॥
अथ तृतीय खण्ड । अथ रसायनवाजीकरणाधिकार । रसायनके लक्षण । सुस्थस्यौजस्करं किञ्चित्किञ्चिदार्तस्य रोगनुत् । यज्जराव्याधिविध्वंसि भेषजं तद्रसायनम् ॥ १ ॥ जिस औषधिके सेवन करनेसे स्वस्थ मनुष्यके ओजकी वृद्धि होती है और रोगी मनुष्यके रोगोंकी निवृत्ति होती है तथा जो जरा और व्याधियोंको दूर करती है उस औषधिको रसायन कहते हैं ॥ १ ॥ श्रीमन्मथ रस । रसगन्धकयोर्ग्राह्य कर्षमेकं सुशोधितम् । अभ्रं निश्चन्द्रकं दद्यात्पलार्द्धं सुविचक्षणः ॥ २ ॥ कर्पूरं शाणकं दद्याद्वङ्गञ्च कोलसम्मितम् । ताम्रं कोलार्द्धकं तत्र निःशेषमारितं क्षिपेत् ॥ ३ ॥ लौहं कर्षं सुजीर्णञ्च वृद्धदारकबीजकम् । विदारी शतमूली च क्षुरबीजं बला तथा ॥ ४ ॥ मर्कट्यतिबला चैव जातीकोषफले तथा । लवङ्गं विजयाबीजं श्वेतसर्जं यमानिका ॥ ५ ॥ एतेषां चूर्णमादाय प्रक्षिपेच्छाणसम्मितम् । गुञ्जाद्वयञ्च भोक्तव्यं कोष्णं क्षीरं पिबेदनु ॥ ६ ॥ गृहे यस्य शतं स्त्रीणां विद्यतेऽतिव्यवायिनः । न तस्य लिंगशैथिल्यमौषधस्यास्य सेवनात् ॥ ७ ॥ न च शुक्रं क्षयं याति न बलं ह्रासतां व्रजेत् । कामरूपी भवेद्दिव्यो वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥ ८ ॥ रसायनवरो बल्यो वाजीकरण उत्तमः। रसः श्रीमन्मथो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ ९ ॥
( ५२८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह। पारा, १ कर्ष, गंधक १ कर्ष, अभ्रकभस्म २ तोले, कपूर ४ मासे, वंगभस्म आधा तोला, तांबाभस्म ३ मासे, लोहभस्म १ कर्ष, विधारेके बीज, विदारीकंद, सतावर, तालमखाने, खिरैंटी, कौंच, कंघी, जावित्री, जायफल, लौंग, भांगके बीज, राल और अजवायन इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार मासे इन सबको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् किंचित् गरम दूध पान करे। जो मनुष्य अत्यंत मैथुन करते हैं, जिनके घर सैकड़ो स्त्री हैं वह मनुष्य इस औषधिका सेवन करके सौ स्त्रियोंके साथ संसर्ग करे तो भी लिंग शिथिल, शुक्रक्षय और बलकी हानि नहीं होती है। इस औषधिके प्रभावसे वृद्ध मनुष्य भी सोलह वर्षके युवाके समान कामरूपी और दिव्य शरीरवाला हो जाता है। यह उत्तम औषधि बलकारक और अतीव वाजीकरण है। यह श्रीमन्मथ रस महादेवजीने प्रकाश किया है ॥ २-९ ॥ महेश्वर रस । रसभस्मीकृतं कोलं गन्धकं शोधितं समम् । लौहं कर्षद्वयं ताम्रमर्द्धकोलकसम्मितम् ॥ १० ॥ सुवर्णं जारितं दद्याच्छाणार्द्धं सुविचक्षणः । अभ्रं कर्षद्वयं दद्याच्छाणार्द्धं चन्द्रचूर्णकम् ॥ ११ ॥ श्यामाबीजं वरीञ्चैव बलामतिबलां तथा । एलाञ्च शंखपुष्पञ्च शाणमानं विनिःक्षिपेत् ॥ १२॥ जलेन वटिकां कृत्वा गुञ्जामात्रां प्रदापयेत् । सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ॥ १३ ॥ सहस्रं याति नारीणामुत्साहो जायतेऽधिकः । नित्यं स्त्रीसेवनाद्यस्तु क्षीणशुक्रो भवेन्नरः ॥ १४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५२९ ) महाशुक्रो भवेत्सोऽपि सेवनादस्य नान्यथा । महाबलो मदाबुद्धिर्जायते नात्र संशयः ॥ १५ ॥ स्थूलानां कर्षकः श्रेष्ठः कृशानां पुष्टिकारकः । रसो विनाशयेद्रोगान्सप्तसप्ताहभक्षणात् ॥ १६ ॥ रससिंदूर आधा तोला, शुद्धगंधक आधा तोला, लोहभस्म २ कर्ष, तांबाभस्म ३ मासे, सोनाभस्म २ मासे, अभ्रकभस्म २ कर्ष, कपूर २ मासे, विधारेके बीज, सतावर, खिरेंटी, कंघी, इलायची और शंखाहुली यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औष- धिके सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान हो जाता है तथा हजारों स्त्रियोंसे प्रसंग करनेका उत्साह उत्पन्न होता है । सदैव स्त्री प्रसंग करनेसे जिनका वीर्य क्षय होगया है उनके अधिकतर प्रसंग करनेपर भी अत्यन्त शुक्रकी वृद्धि होती है । यह औषधि स्थूल मनुष्यको कृश और कृश मनुष्यको स्थूल बनाती है । इससे अत्यंत बुद्धि और अतिशय बलकी वृद्धि होती है । सात सप्ताहतक इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इसको महेश्वररस कहते हैं ॥ १०-१६ ॥ पूर्णचन्द्र रस । सूताभ्रलौहं सशिलाजतु स्याद्विडङ्गताप्यं मधुना घृतेन । संमर्द्य सर्वं खलु पूर्णचन्द्रो माषोऽस्य वृष्यो भवति प्रयुक्तः॥ रससिंदूर, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, शिलाजीत, वायविडंग और सोनामाखीभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र पीसकर घृत और सहतमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि होती है ॥ १७ ॥
( ५३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कार्श्यहर लौह । श्वेता पुनर्नवा दन्ती वाजिगन्धात्रिकत्रयैः । शतमूलीबलायुक्तैरेभिलोंहं प्रसाधितम् ॥ १७ ॥ निहन्ति नियतं कार्श्यमपि भृङ्गरसैः सह । नास्त्यनेन समं लौहं सर्वरोगान्तकं मतम् ॥ दीपनं बलवर्णाग्निवृष्यदञ्चोत्तमोत्तमम् ॥ १९ ॥ श्वेतपुनर्नवा, दन्तीकी जड़, असगंध, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, दारचीनी, इलायची, तेजपात, सतावर और खिरैंटी इन सब औषधियोंका चूर्ण बनाकर और सब चूर्णकी बराबर लोहा- भस्म मिलावे । इसको अच्छे प्रकारसे खरल करके गोली बना लेवे । इन गोलियोंको भांगरेके रसके साथ सेवन करनेसे कृशता नष्ट होती है । सर्व रोगोंको हरनेवाली इसकी समान अन्य श्रेष्ठ औषधि नहीं है । सम्पूर्ण रसायन औषधियोंमें यह उत्तम रसायन है । इसको कार्श्यहर लौह कहते हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ लक्ष्मीविलास रस । पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ । कर्पूरस्य तदर्द्धञ्च जातीकोषफले तथा ॥ २० ॥ वृद्धदारकबीजं च बीजमुन्मत्तकस्य च । त्रैलोक्यविजयाबीजं विदारीमूलमेव च ॥ २१ ॥ नारायणी तथा नागबला चातिबला तथा । बीजं गोक्षुरकस्यापि नैचुलं बीजमेव च ॥ २२ ॥ एतेषां कार्षिकं चूर्णं पर्णपत्ररसेन च । निष्पिष्य वटिका कार्या त्रिगुञ्जाफलमानतः ॥ २३ ॥ निहन्ति सन्निपातोत्थान्गदान्घोरान्सुदारुणान् । वातोत्थानपि पित्तोत्थान्नास्त्यत्र नियमः क्वचित् २४॥
भाषाटीकासहित । ( ५३१ ) कुष्ठमष्टादशाख्यञ्च प्रमेहान्विंशतिं तथा । नाडीव्रणं व्रणं घोरं गुदामयभगन्दरम् ॥ २५ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं चिरजं कुलसम्भवम् । गलशोथमन्त्रवृद्धिमतीसारं सुदारुणम् ॥ २६ ॥ कासपीनसयक्ष्माऽर्शः स्थौल्यं दौर्गन्ध्यमेव च । आमवातं सर्वरूपं जिह्वास्तम्भं गलग्रहम् ॥२७॥ अर्दितं गलगण्डञ्च वातशोणितमेव च । उदरं कर्णनासाक्ष्मुखवैरस्यमेव च ॥ सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीणां गदनिषूदनम् ॥ २८ ॥ कृष्णाभ्रकभस्मका चूर्ण १ पल, पारा २ तोले, गंधक २ तोले, कपूर, जावित्री, जायफल, विधारेके बीज, धतूरेके बीज, भांगके बीज, विदारीकंद, सतावर, गंगेरन, कंघी, गोखुरुके बीज और हिज्जल (समुद्रफल) के बीज इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पानोंके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बनाकर भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे घोरतर त्रिदोषज रोग, वातज और पित्तज रोग, अठारह प्रका- रके कुष्ठ, बीस प्रकारका प्रमेह, नाडीव्रण, गुदजरोग, भगन्दर, कफ- वातज श्लीपद, बहुत दिनोंका और वंशसे उत्पन्न हुआ श्लीपदरोग, गलशोथ, अन्त्रवृद्धि, अतिसार, खांसी, पीनस, राजयक्ष्मा, बवासीर, मेद, शरीरकी दुर्गंध, सब प्रकारके रूपवाला आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलेकी पीड़ा, अर्दित, गलगण्ड, वातरक्त, उदररोग, कान-नाक-आंख- के रोग और मुँहका बिगाड़, सब प्रकारका शूल, शिरःशूल और स्त्रीरोग नष्ट होते हैं ॥ २०–२८ ॥ वटिकां प्रातरैकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् । अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं पिष्टं पयो दधि ॥ २९ ॥
( ५३२ ) रसेंद्रसारसंग्रह । वारिभक्तसुरासीधुसेवनात्कामरूपधृक् । वृद्धोऽपि तरुणस्पर्द्धी न च शुक्रस्य संक्षयः ॥३०॥ न च लिङ्गस्य शैथिल्यं न केशा यान्ति पक्कताम् । नित्यं स्त्रीणां शतं गच्छेन्मत्तवारणविक्रमः ॥३१॥ द्विलक्षयोजनी दृष्टिर्जायते पौष्टिकः परः । प्रोक्तः प्रयोगराजोऽयं नारदेन महात्मना ॥३२॥ रसो लक्ष्मीविलासोऽयं वासुदेवो जगत्पतिः । अभ्यासादस्य भगवाँल्लक्षनारीषु वल्लभः ॥३३॥ प्रतिदिन प्रातःकाल इनमेंसे एक गोली खाकर मांस, पक्वान्न, मिष्टान्न, दूध, दही, मांडसमेत भात, मदिरा और सीधुनामवाली मदि- राका सेवन करे । इससे कामदेवके समान स्वरूप होजाता है; वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान कामनाओंवाला होता है । मैथुनके सिवाय कदापि वीर्यक्षय नहीं होता । लिंगमें शिथिलता उत्पन्न नहीं होती । बाल कदापि नहीं पकते । मदोन्मत्त हाथीके समान उन्मत्त होकर सैकड़ों स्त्रियोंसे विषय करनेको समर्थ होता है । उसकी दृष्टिशक्ति दो लक्ष योजनकी हो जाती है । यह औषधि अतीव पुष्टिकारक है । महात्मा नारदजीने यह श्रेष्ठ औषधि कही है । श्रीकृष्ण भगवान् इसी औषधिका सेवन करके लक्ष स्त्रियोंके प्रिय हुए थे ॥ २९-३३॥ श्रीकामदेव रस । कामदेवमथो सूतं कामिनां कामदं सदा । यस्य प्रसादतो बल्यो रम्यश्च रमते स्त्रियम् ॥ ३४ ॥ पारदं पलमेकं स्याद्विपलं शुद्धगन्धकम् । रक्तकार्पासतोयेन घृष्ट्वा काचस्य कुप्यतः ॥ ३५ ॥ निक्षिप्य टंकणेनैव मुखं तस्य निरोधयेत् । वालुकायन्त्रमध्यस्थं कुप्यञ्च कुरुते दृढम् ॥ ३६ ॥
भाषाटीकासहित । (५३३) अहोरात्रं पचेदग्नौ शास्त्रवित्कुशलो भिषक् । शीते चादाय पात्रस्थं कुपिकान्तरलम्बितम् ॥३७॥ दरदेन समं रक्तं सोज्ज्वलं भस्म यद्भवेत् । भक्षयेन्मासमेकञ्च घृतेन मधुना सह ॥ ३८ ॥ पश्चाद्दुग्धं गुडं चाज्यं कृष्णेक्षुमपि शर्कराम् । द्राक्षाखर्जूरमधुकप्रभृतीनथ भक्षयेत् ॥ ३९ ॥ त्रिफला मधुना शान्तिं याति पित्तं चिरोद्भवम् । निर्गुण्डिकारसेनात्र दुर्वारवातवेदनाम् ॥ ४० ॥ प्रशमं याति वेगेन नूतनश्च वपुर्भवेत् । अर्द्धावर्तितदुग्धेन गृह्यते यद्ययं रसः ॥ वन्ध्यापि च भवत्येव जीववत्सा सुपुत्रिका ॥ ४१ ॥ अब कामदेव रसको कहते हैं-यह कामदेव रस कामी मनुष्योंके कामको दीपन करनेवाला है । इसके प्रसादसे मनुष्य बलवान् और रमणीयकांतियुक्त होकर अनेक स्त्रियोंमें गमन कर सकता है । शुद्ध पारा ४ तोले और शुद्ध गन्धक ८ तोले लेवे । इन दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बनाकर, लाल कपासके फूलोंके रसमें पीसकर धूपमें सुखा लेवे । पश्चात् कपरौटी की हुई और धूपमें सुखाई हुई कांचकी सीसी ( आतसी सीसी ) में उक्त कज्जलीको रखकर सुहागेसे मुखको बन्द करके वालुकायन्त्रमें एक दिनरात पकावे। जब अपने आप शीतल होजाय तब शीशीमें लगे हुए सिंग्रफके समान लाल रंगके पदार्थको ग्रहण करके एक मासे परिमाण घी और सहतमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे दूधको पान करे । तथा गुड़, घी, काले रंगकी ईख, मिश्री, दाख, खजूर और मुलैठी इत्यादि भक्षण करे । त्रिफलेके रस और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत कालसे उत्पन्न हुआ कुपित पित्त शान्त होता है और सम्हाळूके रसके साथ सेवन करनेसे