भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 547

भाषाटीकासहित । ( ५२१ ) दूसरी महाअभ्र वटी-अभ्रककी भस्म, लोहभस्म, मैनशिल, तांबा- भस्म, पारा, गंधक, सुहागा, जवाखार और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला और त्रिकुटा पांच तोले लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर चूर्ण बनाकर गीमाका शाक, अडूसा और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको सूतिकारोगको दूर करनेके लिये प्रयुक्त करे ॥ ३४-३६ ॥ रसशार्दूल रस । अभ्रं ताम्रं तथा लौहं राजपहं रसं तथा । गन्धटंकमरीचञ्च यवक्षारं समांशकम् ॥ ३७ ॥ तथाऽत्र तालकञ्चैव त्रिफलायाश्च तोलकम् । तोलकञ्चामृतञ्चैव षड्गुञ्जाप्रमिता वटी ॥ ३८ ॥ ग्रीष्मसुन्दरकस्यापि नागवल्लीरसेन च । भावयेत्सप्तधा हन्ति ज्वरकासाङ्गसंग्रहम् ॥ सूतिकातङ्कशोथादिस्त्रीरोगञ्च विनाशयेत् ॥ ३९ ॥ अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, राजपह, पारा, गंधक, सुहागा, मरिच, जवाखार, हरताल, त्रिफला और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । सबको एकत्र पीसकर गीमाके शाक और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर छः छः रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे ज्वर, खाँसी, शरीरकी पीड़ा और सूतिकादि स्त्रीरोग नष्ट होते हैं ॥ ३७-३९ ॥ महाशार्दूल रस । अभ्रकं पुटितं ताम्रं स्वर्णं गन्धञ्च पारदम् । शिला टङ्कं यवक्षारं त्रिफायाः पलं पलम् ॥ ४० ॥