भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 584 में से

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(५२२) रसेन्द्रसारसंग्रह । गरलस्य तथा ग्राह्यमर्द्धतोलकसम्मितम् । त्वगेलापत्रकञ्चैव जातीकोषलवङ्गकम् ॥ ४१ ॥ मांसी तालीशपत्रञ्च माक्षिकञ्च रसाञ्जनम् । एषां द्विकार्षिकं भागं देयञ्चापि विचक्षणैः ॥ ४२ ॥ द्रवे किञ्चित्स्थिते चूर्णं मरिचस्य पलं क्षिपेत् । भावना च प्रदातव्या पूर्वोक्तेन रसेन च ॥४३॥ निहन्ति विविधान्रोगान्ज्वरान्दाहान्वमिं भ्रमम् । तथातिसारकञ्चैव वह्निमान्द्यमरोचकम् ॥ विशेषाद्गार्भिणीरोगं नाशयेदचिरेण च ॥ ४४ ॥ अभ्रक, तांबा, सोना इन सबकी भस्म, गंधक, पारा, मैनशिल, सुहागा, जवारखार और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले परिमाण, विष ६ मासे, दालचीनी, इलायची, तेजपात, जावित्री, लौंग, बालछड़, तालीशपत्र, सोनामाखीभस्म और रसौत यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष परिमाण लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गीमेका शाक और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे । जब कुछ पतला होजावे तब इसमें चार तोले कालीमिरचोंका चूर्ण डालकर गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ज्वर, दाह, वमन, भ्रम, अतिसार, मन्दाग्नि और अरुचिप्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं तथा थोड़े ही दिनोंमें गर्भवतीके समस्त रोग दूर हो जाते हैं ॥ ४०-४४ ॥ बृहद्रसशार्दूल रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं शुद्धं संमर्दयेद्दिनम् । प्रतिलौहं सूततुल्यमष्टलौहं मृतं क्षिपेत् ॥ ४५ ॥ ब्राह्मी जयन्ती निर्गुण्डी मधुयष्टिः पुनर्नवा । नलिकागिरिकर्ण्यर्ककृष्णधूर्त्तदुरालभाः ॥ ४६ ॥

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