भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ५२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ग्रीष्मसुन्दरकस्याटरूषकस्य क्रमेण तु । रसैस्ताम्बूलवल्ल्याश्च दलोत्थैर्भावितं पृथक् ॥ ३१ ॥ द्रवे किञ्चित्स्थिते चूर्णं मरिचस्य पलं क्षिपेत् । सर्वातीसारशमनं सर्वशूलनिवारणम् ॥ ३२ ॥ सूतिकाशोथपाण्डुत्वं सर्वज्वरविनाशनम् । नाशयेत्सूतिकातङ्कं वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३३ ॥ अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, गंधक, पारा, मैनशिल, सुहागा, जवाखार और त्रिफला प्रत्येक एक एक पल और विष चार मासे लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर ग्रीष्मसुन्दर (गीमा यह किसी देशकी भाषा ), अडूसेके पत्ते और पान इन प्रत्येकके एक एक पल रसके द्वारा अलग अलग भावना देवे । जब यह भीग जाय तब इसमें काली- मिरचोंका चूर्ण मिला देवे । फिर कुछ समयतक मर्दन करके यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे। इस औषधिके भक्षण करनेसे सब प्रकारका अतिसार, सब प्रकारका शूल, सूतिका रोग, शोथ, पांडु और सर्व प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । जिसप्रकार वज्रसे वृक्षोंका नाश होता है उसी प्रकार इससे सूतिकारोग नष्ट होता है ॥ २९–३३ ॥ मृतमभ्रञ्च लौहञ्च कुनटी ताम्रकं तथा । रसगन्धकटंकञ्च यवक्षारफलत्रिकम् ॥ ३४ ॥ प्रत्येकं तोलकं ग्राह्यमूषणं पञ्चतोलकम् । सर्वमेकीकृतं चूर्णं प्रत्येकेन विभावयेत् ॥ ३५ ॥ ग्रीष्मसुन्दरसिंहस्य नागवल्ल्या रसेन च । चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ योजयेत्सर्वथा वैद्यः सूतिकारोगशान्तये ॥ ३६ ॥