भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (५१९) सूतिकाहर रस । लवङ्गं रसगन्धौ च यवक्षारं तथाऽभ्रकम् । लौहं ताम्रं सीसकञ्च पलमानं समाहरेत् ॥ २५ ॥ जातीफलं केशराजं वराभृङ्गैलमुस्तकम् । धातकीन्द्रयवं पाठा शृङ्गी बिल्वञ्च वालकम् ॥ २६ ॥ कर्षमानञ्च संचूर्ण्य सर्वमेकत्र कारयेत् । बदरास्थिप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २७ ॥ गन्धालिकापत्ररसैरनुपानं प्रदापयेत् । सर्वातीसारशमनः सर्वशूलनिवारणः ॥ सूतिकाहरनामाऽयं रसः परमदुर्ल्लभः ॥ २८ ॥ लौंग, पारा, गंधक, जवाखार, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, तांबाभस्म और सीसाभस्म यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले, जायफल, कुकुर- भांगरा, त्रिफला, भांगरा, इलायची, नागरमोथा, धायके फूल, इन्द्रजौ, पाठ, काकड़ासिंगी, बेलकी छाल और सुगंधवाला यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेकर अच्छे प्रकारसे पीसकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंको प्रसारणीके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके अतिसार और सर्व प्रकारके शूल रोग नष्ट होते हैं । इसको सूतिकाहर रस कहते हैं ॥ २५–२८ ॥ महाभ्र वटी । अभ्रकं पुटितं ताम्रं लौहं गन्धकपारदम् । कुनटी टङ्कणं क्षारं त्रिफला च पलं पलम् ॥ २९ ॥ गरलञ्च तथा माषचतुष्कञ्चैव चूर्णितम् । तत्सर्वं भावयेदेषां रसैः प्रत्येकशः पलैः ॥ ३० ॥