रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बृहत् गर्भचिंतामणि रस । सूतं गन्धं तथा स्वर्णं लौहं रजतमाक्षिके । हरितालं वङ्गभस्माप्यभ्रकं समभागिकम् ॥ २० ॥ भावना खलु दातव्या रसैरेषां पृथक् पृथक् । ब्राह्मीवासाभृगराजपर्पटीदशमूलकैः ॥ २१ ॥ सप्तधा भावयेद्वैद्यो गुञ्जामात्रां वटीञ्चरेत् । गर्भचिन्तामणिरयं पूर्ववद्गुणकारकः ॥ २२ ॥ पारा, गंधक, सोना, लोहा, रूपा, सोनामाखी, हरिताल, वंग और अभ्रककी भस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर ब्राह्मी, अडूसा, भांगरा, पित्तपापड़ा और दशमूलके क्वाथमें अलग अलग सात सात भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे। यह औषधि गर्भ- चिंतामणि रसकी समान हितकारी है ॥ २०–२२ ॥ गर्भविनोद रस । देयं त्रिभागं त्रिकटु चतुर्भागञ्च हिंगुलम् । जातीकोषं लवङ्गञ्च प्रत्येकं च त्रिकार्षिकम् ॥ २३ ॥ सुवर्णमाक्षिकस्यापि पलार्द्धं प्रक्षिपेद्बुधः । जलेन मर्दयित्वाथ चणमात्रा वटी कृता ॥ निहन्ति गर्भिणीरोगं भास्करस्तिमिरं यथा ॥ २४ ॥ त्रिकुटेका चूर्ण ३ कर्ष, सिंग्रफ ४ कर्ष, जावित्री और लौंग यह प्रत्येक औषधि तीन तीन कर्ष परिमाण लेवे, सोनामाखी २ तोले इन सब औष- धियोंको एकत्र जलमें पीसकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे। इस औष- धिके सेवन करनेसे गर्भिणीके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥