भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ५३१ ) कुष्ठमष्टादशाख्यञ्च प्रमेहान्विंशतिं तथा । नाडीव्रणं व्रणं घोरं गुदामयभगन्दरम् ॥ २५ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं चिरजं कुलसम्भवम् । गलशोथमन्त्रवृद्धिमतीसारं सुदारुणम् ॥ २६ ॥ कासपीनसयक्ष्माऽर्शः स्थौल्यं दौर्गन्ध्यमेव च । आमवातं सर्वरूपं जिह्वास्तम्भं गलग्रहम् ॥२७॥ अर्दितं गलगण्डञ्च वातशोणितमेव च । उदरं कर्णनासाक्ष्मुखवैरस्यमेव च ॥ सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीणां गदनिषूदनम् ॥ २८ ॥ कृष्णाभ्रकभस्मका चूर्ण १ पल, पारा २ तोले, गंधक २ तोले, कपूर, जावित्री, जायफल, विधारेके बीज, धतूरेके बीज, भांगके बीज, विदारीकंद, सतावर, गंगेरन, कंघी, गोखुरुके बीज और हिज्जल (समुद्रफल) के बीज इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पानोंके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बनाकर भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे घोरतर त्रिदोषज रोग, वातज और पित्तज रोग, अठारह प्रका- रके कुष्ठ, बीस प्रकारका प्रमेह, नाडीव्रण, गुदजरोग, भगन्दर, कफ- वातज श्लीपद, बहुत दिनोंका और वंशसे उत्पन्न हुआ श्लीपदरोग, गलशोथ, अन्त्रवृद्धि, अतिसार, खांसी, पीनस, राजयक्ष्मा, बवासीर, मेद, शरीरकी दुर्गंध, सब प्रकारके रूपवाला आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलेकी पीड़ा, अर्दित, गलगण्ड, वातरक्त, उदररोग, कान-नाक-आंख- के रोग और मुँहका बिगाड़, सब प्रकारका शूल, शिरःशूल और स्त्रीरोग नष्ट होते हैं ॥ २०–२८ ॥ वटिकां प्रातरैकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् । अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं पिष्टं पयो दधि ॥ २९ ॥