रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३२ ) रसेंद्रसारसंग्रह । वारिभक्तसुरासीधुसेवनात्कामरूपधृक् । वृद्धोऽपि तरुणस्पर्द्धी न च शुक्रस्य संक्षयः ॥३०॥ न च लिङ्गस्य शैथिल्यं न केशा यान्ति पक्कताम् । नित्यं स्त्रीणां शतं गच्छेन्मत्तवारणविक्रमः ॥३१॥ द्विलक्षयोजनी दृष्टिर्जायते पौष्टिकः परः । प्रोक्तः प्रयोगराजोऽयं नारदेन महात्मना ॥३२॥ रसो लक्ष्मीविलासोऽयं वासुदेवो जगत्पतिः । अभ्यासादस्य भगवाँल्लक्षनारीषु वल्लभः ॥३३॥ प्रतिदिन प्रातःकाल इनमेंसे एक गोली खाकर मांस, पक्वान्न, मिष्टान्न, दूध, दही, मांडसमेत भात, मदिरा और सीधुनामवाली मदि- राका सेवन करे । इससे कामदेवके समान स्वरूप होजाता है; वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान कामनाओंवाला होता है । मैथुनके सिवाय कदापि वीर्यक्षय नहीं होता । लिंगमें शिथिलता उत्पन्न नहीं होती । बाल कदापि नहीं पकते । मदोन्मत्त हाथीके समान उन्मत्त होकर सैकड़ों स्त्रियोंसे विषय करनेको समर्थ होता है । उसकी दृष्टिशक्ति दो लक्ष योजनकी हो जाती है । यह औषधि अतीव पुष्टिकारक है । महात्मा नारदजीने यह श्रेष्ठ औषधि कही है । श्रीकृष्ण भगवान् इसी औषधिका सेवन करके लक्ष स्त्रियोंके प्रिय हुए थे ॥ २९-३३॥ श्रीकामदेव रस । कामदेवमथो सूतं कामिनां कामदं सदा । यस्य प्रसादतो बल्यो रम्यश्च रमते स्त्रियम् ॥ ३४ ॥ पारदं पलमेकं स्याद्विपलं शुद्धगन्धकम् । रक्तकार्पासतोयेन घृष्ट्वा काचस्य कुप्यतः ॥ ३५ ॥ निक्षिप्य टंकणेनैव मुखं तस्य निरोधयेत् । वालुकायन्त्रमध्यस्थं कुप्यञ्च कुरुते दृढम् ॥ ३६ ॥