भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । (५३३) अहोरात्रं पचेदग्नौ शास्त्रवित्कुशलो भिषक् । शीते चादाय पात्रस्थं कुपिकान्तरलम्बितम् ॥३७॥ दरदेन समं रक्तं सोज्ज्वलं भस्म यद्भवेत् । भक्षयेन्मासमेकञ्च घृतेन मधुना सह ॥ ३८ ॥ पश्चाद्दुग्धं गुडं चाज्यं कृष्णेक्षुमपि शर्कराम् । द्राक्षाखर्जूरमधुकप्रभृतीनथ भक्षयेत् ॥ ३९ ॥ त्रिफला मधुना शान्तिं याति पित्तं चिरोद्भवम् । निर्गुण्डिकारसेनात्र दुर्वारवातवेदनाम् ॥ ४० ॥ प्रशमं याति वेगेन नूतनश्च वपुर्भवेत् । अर्द्धावर्तितदुग्धेन गृह्यते यद्ययं रसः ॥ वन्ध्यापि च भवत्येव जीववत्सा सुपुत्रिका ॥ ४१ ॥ अब कामदेव रसको कहते हैं-यह कामदेव रस कामी मनुष्योंके कामको दीपन करनेवाला है । इसके प्रसादसे मनुष्य बलवान् और रमणीयकांतियुक्त होकर अनेक स्त्रियोंमें गमन कर सकता है । शुद्ध पारा ४ तोले और शुद्ध गन्धक ८ तोले लेवे । इन दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बनाकर, लाल कपासके फूलोंके रसमें पीसकर धूपमें सुखा लेवे । पश्चात् कपरौटी की हुई और धूपमें सुखाई हुई कांचकी सीसी ( आतसी सीसी ) में उक्त कज्जलीको रखकर सुहागेसे मुखको बन्द करके वालुकायन्त्रमें एक दिनरात पकावे। जब अपने आप शीतल होजाय तब शीशीमें लगे हुए सिंग्रफके समान लाल रंगके पदार्थको ग्रहण करके एक मासे परिमाण घी और सहतमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे दूधको पान करे । तथा गुड़, घी, काले रंगकी ईख, मिश्री, दाख, खजूर और मुलैठी इत्यादि भक्षण करे । त्रिफलेके रस और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत कालसे उत्पन्न हुआ कुपित पित्त शान्त होता है और सम्हाळूके रसके साथ सेवन करनेसे