भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ५३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कष्टसाध्य वायुकी पीड़ा दूर होकर शरीर नवीन होजाता है। अधौटे दूधके साथ इसके सेवन करनेसे वंध्या स्त्रियोंके भी पुत्र उत्पन्न होता है ॥ ३४-४१ ॥ अनंगसुन्दर रस । शुद्धसूतं समं गन्धं त्र्यहं कह्लारजैर्द्रवैः । मर्दितं वालुकायन्त्रे यामं संपुटके पचेत् ॥ ४२ ॥ रक्तागस्त्यद्रवैर्भाव्यं दिनमेकं सिताम्बुजैः । यथेष्टं भक्षयेच्चानु कामयेत्कामिनीशतम् ॥ ४३ ॥ शुद्ध पारा और गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे। फिर इस कज्जलीको कुमुदपुष्पके रसमें पीसकर गोलासा बना लेवे। फिर इस गोलेको मूषामें रखकर बालु- कायन्त्रमें एक प्रहरतक पकावे। पश्चात् लाल अगस्तियाके पत्तोंके रसमें और सफेद कमलके रसमें एक दिनतक खरल करके यथोचित मात्रासे इसका सेवन करे। इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार करे। इसके भक्षण करनेसे मनुष्य अधिक शुक्रवान् होकर सौ स्त्रियोंमें गमन करनेकी इच्छा करता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ हेमसुन्दर रस । मृतसूतस्य पादांशं हेमभस्म प्रकल्पयेत् । क्षीराज्यदधिसंमिश्रं माषकं कांस्यपात्रके ॥ ४४ ॥ लेहयेन्मासषट्कन्तु जरामरणनाशनम् । वागुजीचूर्णकर्षैकं धात्रीफलरसाप्लुतम् ॥ अनुपानं पिबेन्नित्यं स्याद्रसो हेमसुन्दरः ॥ ४५ ॥ रससिन्दूर ४ भाग और सोनेकी भस्म १ भाग लेवे। इन दोनों औष- धियोंको एकत्र पीसकर दूध, घी और दही मिलाकर कांसेके पात्रमें घिसकर प्रतिदिन एक मासे पारमाण सेवन करे। छः महीने तक यह