भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ५३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कार्श्यहर लौह । श्वेता पुनर्नवा दन्ती वाजिगन्धात्रिकत्रयैः । शतमूलीबलायुक्तैरेभिलोंहं प्रसाधितम् ॥ १७ ॥ निहन्ति नियतं कार्श्यमपि भृङ्गरसैः सह । नास्त्यनेन समं लौहं सर्वरोगान्तकं मतम् ॥ दीपनं बलवर्णाग्निवृष्यदञ्चोत्तमोत्तमम् ॥ १९ ॥ श्वेतपुनर्नवा, दन्तीकी जड़, असगंध, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, दारचीनी, इलायची, तेजपात, सतावर और खिरैंटी इन सब औषधियोंका चूर्ण बनाकर और सब चूर्णकी बराबर लोहा- भस्म मिलावे । इसको अच्छे प्रकारसे खरल करके गोली बना लेवे । इन गोलियोंको भांगरेके रसके साथ सेवन करनेसे कृशता नष्ट होती है । सर्व रोगोंको हरनेवाली इसकी समान अन्य श्रेष्ठ औषधि नहीं है । सम्पूर्ण रसायन औषधियोंमें यह उत्तम रसायन है । इसको कार्श्यहर लौह कहते हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ लक्ष्मीविलास रस । पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ । कर्पूरस्य तदर्द्धञ्च जातीकोषफले तथा ॥ २० ॥ वृद्धदारकबीजं च बीजमुन्मत्तकस्य च । त्रैलोक्यविजयाबीजं विदारीमूलमेव च ॥ २१ ॥ नारायणी तथा नागबला चातिबला तथा । बीजं गोक्षुरकस्यापि नैचुलं बीजमेव च ॥ २२ ॥ एतेषां कार्षिकं चूर्णं पर्णपत्ररसेन च । निष्पिष्य वटिका कार्या त्रिगुञ्जाफलमानतः ॥ २३ ॥ निहन्ति सन्निपातोत्थान्गदान्घोरान्सुदारुणान् । वातोत्थानपि पित्तोत्थान्नास्त्यत्र नियमः क्वचित् २४॥