रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५२९ ) महाशुक्रो भवेत्सोऽपि सेवनादस्य नान्यथा । महाबलो मदाबुद्धिर्जायते नात्र संशयः ॥ १५ ॥ स्थूलानां कर्षकः श्रेष्ठः कृशानां पुष्टिकारकः । रसो विनाशयेद्रोगान्सप्तसप्ताहभक्षणात् ॥ १६ ॥ रससिंदूर आधा तोला, शुद्धगंधक आधा तोला, लोहभस्म २ कर्ष, तांबाभस्म ३ मासे, सोनाभस्म २ मासे, अभ्रकभस्म २ कर्ष, कपूर २ मासे, विधारेके बीज, सतावर, खिरेंटी, कंघी, इलायची और शंखाहुली यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औष- धिके सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान हो जाता है तथा हजारों स्त्रियोंसे प्रसंग करनेका उत्साह उत्पन्न होता है । सदैव स्त्री प्रसंग करनेसे जिनका वीर्य क्षय होगया है उनके अधिकतर प्रसंग करनेपर भी अत्यन्त शुक्रकी वृद्धि होती है । यह औषधि स्थूल मनुष्यको कृश और कृश मनुष्यको स्थूल बनाती है । इससे अत्यंत बुद्धि और अतिशय बलकी वृद्धि होती है । सात सप्ताहतक इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इसको महेश्वररस कहते हैं ॥ १०-१६ ॥ पूर्णचन्द्र रस । सूताभ्रलौहं सशिलाजतु स्याद्विडङ्गताप्यं मधुना घृतेन । संमर्द्य सर्वं खलु पूर्णचन्द्रो माषोऽस्य वृष्यो भवति प्रयुक्तः॥ रससिंदूर, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, शिलाजीत, वायविडंग और सोनामाखीभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र पीसकर घृत और सहतमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि होती है ॥ १७ ॥