रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह। पारा, १ कर्ष, गंधक १ कर्ष, अभ्रकभस्म २ तोले, कपूर ४ मासे, वंगभस्म आधा तोला, तांबाभस्म ३ मासे, लोहभस्म १ कर्ष, विधारेके बीज, विदारीकंद, सतावर, तालमखाने, खिरैंटी, कौंच, कंघी, जावित्री, जायफल, लौंग, भांगके बीज, राल और अजवायन इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार मासे इन सबको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् किंचित् गरम दूध पान करे। जो मनुष्य अत्यंत मैथुन करते हैं, जिनके घर सैकड़ो स्त्री हैं वह मनुष्य इस औषधिका सेवन करके सौ स्त्रियोंके साथ संसर्ग करे तो भी लिंग शिथिल, शुक्रक्षय और बलकी हानि नहीं होती है। इस औषधिके प्रभावसे वृद्ध मनुष्य भी सोलह वर्षके युवाके समान कामरूपी और दिव्य शरीरवाला हो जाता है। यह उत्तम औषधि बलकारक और अतीव वाजीकरण है। यह श्रीमन्मथ रस महादेवजीने प्रकाश किया है ॥ २-९ ॥ महेश्वर रस । रसभस्मीकृतं कोलं गन्धकं शोधितं समम् । लौहं कर्षद्वयं ताम्रमर्द्धकोलकसम्मितम् ॥ १० ॥ सुवर्णं जारितं दद्याच्छाणार्द्धं सुविचक्षणः । अभ्रं कर्षद्वयं दद्याच्छाणार्द्धं चन्द्रचूर्णकम् ॥ ११ ॥ श्यामाबीजं वरीञ्चैव बलामतिबलां तथा । एलाञ्च शंखपुष्पञ्च शाणमानं विनिःक्षिपेत् ॥ १२॥ जलेन वटिकां कृत्वा गुञ्जामात्रां प्रदापयेत् । सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ॥ १३ ॥ सहस्रं याति नारीणामुत्साहो जायतेऽधिकः । नित्यं स्त्रीसेवनाद्यस्तु क्षीणशुक्रो भवेन्नरः ॥ १४ ॥