रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५२५ ) प्रमाणं सर्षपाकारं बालानाञ्च प्रयोजयेत् । हन्ति त्रिदोषसम्भूतं ज्वरञ्चैव सुदारुणम् ॥ कासञ्च विविधं चैव सर्वरोगं निहन्ति च ॥ ११ ॥ इति बालरोगचिकित्सा । शुद्ध पारा १ पल, गंधक १ पल और सोनामाखी २ तोले इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर लोहेके दृढ पात्रमें कुकुरभांगरा, भांगरा, सम्हालू, पान, मकोय, गीमा, हुलहुल, पुनर्नवा, मण्डूकपर्णी और श्वेत कोइल इन प्रत्येकके रसके द्वारा अलग अलग खरल करके पश्चात् पारेसे आधा भाग कालीमिरचोंका चूर्ण मिलाकर उत्तम पत्थ- रके पात्रमें एक प्रहरतक खरल करके सरसोंकी बराबर गोली बना लेवे और फिर उनको धूपमें सुखा देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बालकोंका त्रिदोषज ज्वर, विविध प्रकारका कास और सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ६-११ ॥ इति बालरोगाधिकार संपूर्ण । अथ विषाधिकार । विषवज्रपात रस । निशां सटङ्कञ्च सजातिकोषं तुत्थं समांशं कुरु देवदाल्याः । रसेन पिष्ट्वा विषवज्रपातो रसो भवेत् सर्वविषापहन्ता ॥ १ ॥ निष्कोऽस्य सञ्जीवयति प्रयुक्तो नृमूत्रयोगेन च कालदष्टम् । जटाविषेणा- कुलितं तथान्यैर्विषैर्वरञ्चाशु तथातुरं च ॥ २ ॥ हल्दी, सुहागा, जावित्री और तूतिया इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बंदालके रसमें खरल करके चार मासे परिमाण औषधि मनुष्यके मूत्रमें मिलाकर सेवन करे । सर्व प्रकारके विषोंको नष्ट करनेवाली इस औषधिके सेवन करनेसे कालदष्ट मनुष्य भी जीजाता है । मूलविष ( काष्ठविष ) से व्याकुल और अन्यान्य १८