भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ५१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सूतिकाघ्न रस । रसगन्धकलौहाभ्र जातीकोषं सुवर्चलम् । समांशं मर्दयेत्खल्ले छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ १० ॥ गुञ्जाद्वयप्रमाणेन सूतिकातंकनाशनः । ज्वरातीसाररोगघ्नः सूतिकासुखदायकः ॥ सूतिकाघ्नो रसो नाम ब्रह्मणा परिकीर्त्तितः ॥ ११ ॥ पारा, गंधक, लोहा, अभ्रकभस्म, जायफल और कालानमक यह सब औषधि समान भाग लेकर बकरीके दूधमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे ज्वर, अतिसार और सूतिकारोग नष्ट होते हैं । इसको स्वयं ब्रह्मदेवने कहा है ॥ १० ॥ ११ ॥ सूतिकान्तक रस । रसाभ्रगन्धकव्योषं सुवर्णमाक्षिकं विषम् । सर्वमेकीकृतं चूर्णं खादेद्रक्तिचतुष्टयम् ॥ १२ ॥ सूतिकाग्रहणीरोगं वह्निमान्द्यञ्च नाशयेत् । अतिसारञ्च शमयेदपि वैद्यविवर्जितम् ॥ कासश्वासातिसारघ्नो वाजीकरण उत्तमः ॥ १३ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, गंधक, त्रिकुटा, सोनामाखीभस्म और विष यह सब औषधि समान भाग लेकर इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सूतिकारोग, संग्रहणी, मंदाग्नि, वैद्यों करके त्यागा हुआ अतिसार, श्वास, खाँसी और अतिसार रोग नष्ट होते हैं और यह उत्तम वाजीकरण है ॥ १२ ॥ १३ ॥ गर्भचिन्तामणि रस । जातीफलं टंकणञ्च व्योषं दैत्येन्द्ररक्तकम् । तच्चूर्णं समभागेन मर्दितं प्रहरद्वयम् ॥ १४ ॥