रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । औषधिके सेवन करनेसे मनुष्योंकी मृत्यु दूर हो जाती है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे जरा और मृत्यु दूर होती है । इस चंद्रो- दयको तन्त्रान्तरोंमें मकरध्वज कहते हैं ॥ ७०–७३ ॥ मकरध्वज रस । स्वर्णस्य भागौ वङ्गश्च मौक्तिकं कान्तलोहकम् । जातीकोषफले रूप्यं कांस्यकं रससिन्दुरम् ॥ ७४॥ प्रवालं कस्तूरीचन्द्रमभ्रकञ्चैकभागिकम् । स्वर्णसिन्दूरतो भागाश्चत्वारः कल्पयेद्बुधः ॥ ७५ ॥ नातः परतरः श्रेष्ठः सर्वरोगनिषूदनः । सर्वलोकहितार्थाय शिवेन परिकीर्तितः ॥ ७६ ॥ सोना २ भाग, वंग, मोती, कान्तलोह, जावित्री, जायफल, रूपा, कांसा, रससिंदूर, मूंगा, कस्तूरी, कपूर और अभ्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और स्वर्णसिंदूर ४ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर अच्छे प्रकारसे खरल करके यथामात्राकी वटी बनाकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करे तो सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । यह मकरध्वज रस समस्त प्राणियोंके हितके लिये महादेवने कहा है ॥ ७४–७६ ॥ वसन्ततिलक रस । हेम्नो भस्मकतोलकं घनयुगं लौहात्त्रयः पारदा- च्चत्वारो नियतन्तु वङ्गयुगलञ्चैकीकृतं मर्दयेत् । मुक्ताविद्रुमयो रसेन समता गोक्षूरवासेक्षुणा, सर्वं वन्यकरीषकेण सुदृढं तत्तत्पचेत्सप्तधा ॥ ॥७७॥ कस्तूरीघनसारमर्दितरसः पश्चात्सुसिद्धो भवेत्, कासश्वाससपित्तवातकफजित् पाण्डु-