रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५४१ ) क्षयादीन्हरेत् । शूलादिग्रहणीं विषादिहरणो मेहां- स्तथा विंशतिं, हृद्रोगादिहरो ज्वरादिशमनो वृष्यो वयोवर्द्धनः ॥ श्रेष्ठः पुष्टिकरो वसन्ततिलको मृत्युञ्जयेनोदितः ॥ ७८ ॥ सोनेकी भस्म १ तोला, अभ्रककी भस्म २ तोले, लोहेकी भस्म ३ तोले, रससिन्दूर ४ तोले, वंगभस्म २ तोले, मोतीभस्म ४ तोले और मूंगाभस्म ४ तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोखरू, अडूसा और ईखके रसमें खरल करके अरने उपलोंकी अग्निसे पुट देवे । इस प्रकार गोखरूआदिके रसमें सात वार भावना देकर सात वार पुट देवे। फिर कस्तूरी ४ तोले और कपूर ४ तोले मिलाकर यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करने खांसी, श्वास, वात, पित्त, कफ, पाण्डुरोग, क्षय, शूल,संग्रहणी,अनेक प्रकारका विष, बीस प्रकारके प्रमेह, हृद्रोग और ज्वर रोगादि समस्त नष्ट होते हैं । यह औषधि वीर्य और आयुको बढ़ानेवाली है । यह अतीव पुष्टिकारक वसन्ततिलक नामक रस स्वयं महादेवने कहा है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ वसन्तकुसुमाकर रस । द्विभागं हाटकं चन्द्रं त्रयो वङ्गाहिकान्तकाः । चतुर्भागं शुद्धमभ्रं प्रवालं मौक्तिकं तथा ॥७९॥ भावयेद्गव्यदुग्धेन भावनेक्षुरसेन च । वासालाक्षारसोदीच्यरम्भाकन्दप्रसूनकैः ॥ ८० ॥ शतपुत्रीरसेनैव मालत्याः कुंकुमोदकैः । पश्चान्मृगमदैर्भाव्यं सुगन्धिरससम्भवम् ॥ ८१ ॥ कुसुमाकरविख्यातो वसन्तपदपूर्वकः । गुञ्जाद्वयेन संसेव्यः सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ ८२ ॥