भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ५४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मेहघ्नः कान्तिदश्चैव कामदः पुष्टिदस्तथा । वलीपलितनाशश्च श्रुतिभ्रंशं विनाशयेत् ॥ ८३ ॥ पुष्टिदो बल्यमायुष्यं पुत्रप्रसवकारणः । प्रमेहान्विंशतिश्चैव क्षयमेकादशं तथा ॥ तथा सोमरुजं हन्ति साध्यासाध्यमथापिवा ॥८४॥ सोनाभस्म २ भाग, चान्दीभस्म २ भाग, वंगभस्म ३ भाग, सीसा- भस्म ३ भाग, कान्तलोह भस्म, ३ भाग, अभ्रकभस्म, मूंगाभस्म और मोती यह प्रत्येक औषधि चार चार भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गायके दूध, ईखके रस, अडूसेके पत्तोंके रस, लाखके क्वाथ, सुगंधवालेका रस, केलेकी जडका रस, केलेके फूलोंका रस, सतावरका रस और मालतीके फूलोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे, फिर सुगंधिके लिये कस्तूरीके क्वाथकी भावना देवे। फिर इसकी दो दो रत्तीकी गोली बनाकर मिश्री, सहत और घृतके साथ सेवन करनेसे प्रमेह रोग नष्ट होता है। इससे कान्ति, काम और पुष्टिकी वृद्धि होती है। वली, पलित और श्रुतिभ्रंश नष्ट होता है। यह पुष्टि, बल और आयुवर्द्धक है तथा पुत्रको उत्पन्न करनेवाली है। इससे बीस प्रकारके प्रमेह, ग्यारह प्रकारके क्षय और साध्यासाध्य सोमरोग नष्ट होते हैं। इसको वसन्तकुसुमाकर रस कहते हैं ॥ ७९-८४ ॥ नीलकण्ठ रस । सूतकं गन्धकं लोहं विषं चित्रकपञ्चकम् । वरांगरेणुकामुस्ताग्रन्थैला नागकेशरम् ॥ ८५ ॥ त्रिकत्रयञ्च त्रिफला शुल्वभस्म तथैव च । एतानि समभागानि द्विगुणो गुड उच्यते ॥ ८६ ॥ संमर्द्य वटकं कृत्वा भक्षयेच्चणकोन्मितम् । कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे ॥ ८७ ॥