भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( ५४३ ) हिक्कायां ग्रहणीदोषे शोथे पाण्ड्वामये तथा । मूत्रकृच्छ्रे मूढगर्भे वातरोगे च दारुणे ॥ ८८ ॥ नीलकण्ठो रसो नाम ब्रह्मणा निर्मितः पुरा । अनुपानविशेषेण सर्वरोगहरो भवेत् ॥ ८९ ॥ शुद्ध पारा, गंधक, लोहाभस्म, विष, चित्रककी जड़, पद्माख, दाल- चीनी, रेणुका, नागरमोथा, पीपलामूल, इलायची, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला और तांबाभस्म यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । सबको एकत्र मिलाकर चनेकी बरा- बर गोली बना लेवे । इस औषधिको खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, हिचकी, संग्रहणी, शोथ, पाण्डु, मूत्रकृच्छ्र, मूढगर्भ और दारुण वातरोगमें यथोचित अनुपानके साथ सेवन करे । अनुपान- विशेषके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं । इस नीलकण्ठ रसको स्वयं ब्रह्माजीने कहा है ॥ ८५-८९ ॥ महानीलकण्ठ रस । पलैकं नागभस्माथ भावयेत्तिमिपित्ततः । तन्नागं सुसृतं स्वर्ण तोलैकं वापि मिश्रयेत् ॥ ९० ॥ द्विपलं भस्म सूतस्य त्रिपलं मृतमभ्रकम् । त्रिपलं लौहभस्माथ सर्वमेकत्र कारयेत् ॥ ९१ ॥ भावयेच्च पृथक्कन्या ब्राह्मी निर्गुण्डिका शमी । मुण्डी शतावरी छिन्ना कोकिलाक्षस्य बीजकैः॥९२॥ मूसली वृद्धदारोऽग्मिद्रवैरेभिर्भिषग्वरः । ततः संचूर्णयेत्सर्वं तुल्यमेकादशाभिधम् ॥ ९३ ॥ वराव्योषाब्दवह्रयेला जातीफललवङ्गकम् । पूजयेद्वृषपुष्पाद्यैर्नीलकण्ठं महेश्वरम् ॥ ९४ ॥