भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( ५५५ ) चव्यं कुष्ठं दुरालंभा भार्गी रास्ना च रेणुका । सर्षपा राजिका चैव सिंधुं सर्जरसं तथा ॥ १४ ॥ समभागं विचूर्ण्यैतद्भावयेत् शिग्रुजे द्रवे । शुष्कं विचूर्ण्य तच्चूर्णमातुराङ्गे च मर्दयेत् ॥ ज्वरमष्टविधं हन्यात्सन्निपातं च दारुणम् ॥ १५ ॥ चिरायता, कटुकी, त्रिकुटा, त्रिफला, देवदारु, फूलप्रियंगु, हींग, मंजीठ, सौंफ, सोरा, अजमोद, अजवायन, कचूर, मुलेठी, कुलथी, त्रायमाण, कायफल, अतीस, चव्य, कूठ, जवासा, भारंगी, रास्ना, रेणुका, सरसों, राई, सेंधानमक, राल इन सबको सम भाग लेकर सुहांजनेके रसमें भावना दे, सूखनेपर बारीक पीसकर ज्वरवालेके शरीर- पर इस चूर्णको मर्दन करे तो आठ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके सन्निपात दूर होते हैं ॥ १२-१५ ॥ तीव्रज्वरनाशक धूलन । हरिप्रियबलभद्रामाधवीशृङ्गवेरं कवचजलजवीरं बालकं भद्रकन्दम्। दलरजसमभागं धूलनं यस्य गात्रे शमयति ज्वरतीव्रं सर्वदाहं निहन्ति ॥ १६ ॥ अगरु, त्रायमाण, सौंफ, सोंठ, भोजपत्र, कमल, पोहकरमूल, नेत्र- वाला, नागरमोथे और तेजपत्र इन सबका चूर्ण कर शरीरपर मलेनेसे तीव्रज्वर और दाह दूर होती है ॥ १६ ॥ ज्वरनाशक धूप । पलोन्मितं निम्बपटोलपत्रं कुष्ठं वचागुग्गुलुसर्षपानाम् । हरीतकीसर्पिरितं च धूपं विनाशनं वै विषमज्वराणाम् १७ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे परिशिष्टभागः समाप्तः ।