भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 580

( ५५४ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । ज्वरनाशक नस्य । शुद्धतुत्थं पलैकं च भावयेज्जालिनीरसैः । सप्तविंशतिवारांश्च निम्बूनीरे तथैव च ॥ ९ ॥ शुष्कंनस्यं प्रदातव्यं सर्वज्वरविनाशनम् । यस्मिन्नासापुटे दत्तं ह्यर्द्धाङ्गज्वरनाशनम् ॥१०॥ शुद्ध तूतियेको कड़वी तोरीके रसमें सत्ताईस २७ बार भावना देवे, फिर नींबूके रसमें २७ भावना देकर सुखा ले और पीसकर रखे; इसकी नस्य देनेसे सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं। कौतुक यह है जिस ओरकी नासापुटमें नस्य दे उसी ओरके आधे अंगका ज्वर दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥ अर्द्धाङ्गज्वरनाशक लेप । पौष्करं कट्फलं शुण्ठी मुस्तं जातीफलं समम् । शतपुष्पा शटी चैव छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ कोष्णं कृत्वा ततश्चार्धेज्वराणां नाशनं परम् ॥११॥ पोहकरमूल, कायफल, सोंठ, नागरमोथा, जायफल, सौंफ और कचूर इनको बकरीके दूधमें रगड़कर लेप करनेसे आधे अंगमें होनेवाला ज्वर नष्ट होता है ॥ ११ ॥ सर्वज्वरनाशक धूलन । भूनिम्बकटुकाव्योषं त्रिफलामरदारु च । प्रियंगुहिंगुमंजिष्ठाः शतपुष्पा च कारवी ॥१२॥ अजमोदाजमानी च कचूरमधुकं तथा । कुलत्थं त्रायमाणा च कट्फलातिविषा तथा ॥१३॥