भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 579

भाषाटीकासहित । ( ५५३ ) व्योषञ्च त्रिफलामृतं लौहं वङ्गञ्च ताम्रकम् । पुत्रमातृपयश्चैव कारयेद्वटिकां बुधैः ॥ ४ ॥ दुग्धेन चाञ्जनं कृत्वा एकाङ्गज्वरनाशनम् । द्वितीये चाञ्जनं कृत्वा सर्वांगज्वरनाशनम् ॥ ५ ॥ ३-त्रिकुटा, त्रिफला, मृत पारद, लोहभस्म, वंगभस्म और ताम्र- भस्म इन सबको बांझककौडेकी जड़के रसमें अथवा स्त्रीके दूधमें खरल कर गोली बना ले । इस गोलीको स्त्रीके दूधमें घिसकर एक नेत्रमें अञ्जन करनेसे आधे शरीरका ज्वर नष्ट हो जाता है; दूसरे नेत्रमें आँजनेसे सारे शरीरका ज्वर दूर होता है ॥ ४ ॥ ५ ॥ रसगन्धं शिलातुत्थं तालकं मृतटङ्कणम् । नवसादरकर्षैकमर्कदुग्धेन मर्दयेत् ॥ ६ ॥ चुल्लिकायामथारोप्य पचेद्यामचतुर्दश । स्वांगशीतलमादाय खल्ले तं कज्जलीकृतम् ॥ ७ ॥ अञ्जनं वामनेत्रस्य दक्षिणे कौतुकं भवेत् । दक्षिणे चाञ्जनञ्चैव आरोग्यं भवति क्षणात् ॥ ८ ॥ ४-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, मैनाशिल, नीलाथोथा, शुद्ध हरिताल, मरा हुआ सुहागा और नौसादर इनको एक एक तोला लेकर आकके दूधमें खरल करे, फिर इसको संपुटमें रख एक हांडीमें वह सम्पुट रख दे । फिर उस हांडीको वालुरेतसे भर चूल्हेपर चढ़ावे और चौदह पहरतक नीचे अग्नि जलावे । फिर स्वांगशीतल होनेपर खरलमें डाल पीसकर कज्जली बनावे । यदि इस अञ्जनको वाम नेत्रमें डाले तो दहनी ओर आधे शरीरका ज्वर दूर होता है और दहने नेत्रमें डाले तो सब शरीरका ज्वर उतर जाता है ॥ ६-८ ॥