रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( ५५३ ) व्योषञ्च त्रिफलामृतं लौहं वङ्गञ्च ताम्रकम् । पुत्रमातृपयश्चैव कारयेद्वटिकां बुधैः ॥ ४ ॥ दुग्धेन चाञ्जनं कृत्वा एकाङ्गज्वरनाशनम् । द्वितीये चाञ्जनं कृत्वा सर्वांगज्वरनाशनम् ॥ ५ ॥ ३-त्रिकुटा, त्रिफला, मृत पारद, लोहभस्म, वंगभस्म और ताम्र- भस्म इन सबको बांझककौडेकी जड़के रसमें अथवा स्त्रीके दूधमें खरल कर गोली बना ले । इस गोलीको स्त्रीके दूधमें घिसकर एक नेत्रमें अञ्जन करनेसे आधे शरीरका ज्वर नष्ट हो जाता है; दूसरे नेत्रमें आँजनेसे सारे शरीरका ज्वर दूर होता है ॥ ४ ॥ ५ ॥ रसगन्धं शिलातुत्थं तालकं मृतटङ्कणम् । नवसादरकर्षैकमर्कदुग्धेन मर्दयेत् ॥ ६ ॥ चुल्लिकायामथारोप्य पचेद्यामचतुर्दश । स्वांगशीतलमादाय खल्ले तं कज्जलीकृतम् ॥ ७ ॥ अञ्जनं वामनेत्रस्य दक्षिणे कौतुकं भवेत् । दक्षिणे चाञ्जनञ्चैव आरोग्यं भवति क्षणात् ॥ ८ ॥ ४-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, मैनाशिल, नीलाथोथा, शुद्ध हरिताल, मरा हुआ सुहागा और नौसादर इनको एक एक तोला लेकर आकके दूधमें खरल करे, फिर इसको संपुटमें रख एक हांडीमें वह सम्पुट रख दे । फिर उस हांडीको वालुरेतसे भर चूल्हेपर चढ़ावे और चौदह पहरतक नीचे अग्नि जलावे । फिर स्वांगशीतल होनेपर खरलमें डाल पीसकर कज्जली बनावे । यदि इस अञ्जनको वाम नेत्रमें डाले तो दहनी ओर आधे शरीरका ज्वर दूर होता है और दहने नेत्रमें डाले तो सब शरीरका ज्वर उतर जाता है ॥ ६-८ ॥
( ५५४ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । ज्वरनाशक नस्य । शुद्धतुत्थं पलैकं च भावयेज्जालिनीरसैः । सप्तविंशतिवारांश्च निम्बूनीरे तथैव च ॥ ९ ॥ शुष्कंनस्यं प्रदातव्यं सर्वज्वरविनाशनम् । यस्मिन्नासापुटे दत्तं ह्यर्द्धाङ्गज्वरनाशनम् ॥१०॥ शुद्ध तूतियेको कड़वी तोरीके रसमें सत्ताईस २७ बार भावना देवे, फिर नींबूके रसमें २७ भावना देकर सुखा ले और पीसकर रखे; इसकी नस्य देनेसे सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं। कौतुक यह है जिस ओरकी नासापुटमें नस्य दे उसी ओरके आधे अंगका ज्वर दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥ अर्द्धाङ्गज्वरनाशक लेप । पौष्करं कट्फलं शुण्ठी मुस्तं जातीफलं समम् । शतपुष्पा शटी चैव छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ कोष्णं कृत्वा ततश्चार्धेज्वराणां नाशनं परम् ॥११॥ पोहकरमूल, कायफल, सोंठ, नागरमोथा, जायफल, सौंफ और कचूर इनको बकरीके दूधमें रगड़कर लेप करनेसे आधे अंगमें होनेवाला ज्वर नष्ट होता है ॥ ११ ॥ सर्वज्वरनाशक धूलन । भूनिम्बकटुकाव्योषं त्रिफलामरदारु च । प्रियंगुहिंगुमंजिष्ठाः शतपुष्पा च कारवी ॥१२॥ अजमोदाजमानी च कचूरमधुकं तथा । कुलत्थं त्रायमाणा च कट्फलातिविषा तथा ॥१३॥
भाषाटीकासहित । ( ५५५ ) चव्यं कुष्ठं दुरालंभा भार्गी रास्ना च रेणुका । सर्षपा राजिका चैव सिंधुं सर्जरसं तथा ॥ १४ ॥ समभागं विचूर्ण्यैतद्भावयेत् शिग्रुजे द्रवे । शुष्कं विचूर्ण्य तच्चूर्णमातुराङ्गे च मर्दयेत् ॥ ज्वरमष्टविधं हन्यात्सन्निपातं च दारुणम् ॥ १५ ॥ चिरायता, कटुकी, त्रिकुटा, त्रिफला, देवदारु, फूलप्रियंगु, हींग, मंजीठ, सौंफ, सोरा, अजमोद, अजवायन, कचूर, मुलेठी, कुलथी, त्रायमाण, कायफल, अतीस, चव्य, कूठ, जवासा, भारंगी, रास्ना, रेणुका, सरसों, राई, सेंधानमक, राल इन सबको सम भाग लेकर सुहांजनेके रसमें भावना दे, सूखनेपर बारीक पीसकर ज्वरवालेके शरीर- पर इस चूर्णको मर्दन करे तो आठ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके सन्निपात दूर होते हैं ॥ १२-१५ ॥ तीव्रज्वरनाशक धूलन । हरिप्रियबलभद्रामाधवीशृङ्गवेरं कवचजलजवीरं बालकं भद्रकन्दम्। दलरजसमभागं धूलनं यस्य गात्रे शमयति ज्वरतीव्रं सर्वदाहं निहन्ति ॥ १६ ॥ अगरु, त्रायमाण, सौंफ, सोंठ, भोजपत्र, कमल, पोहकरमूल, नेत्र- वाला, नागरमोथे और तेजपत्र इन सबका चूर्ण कर शरीरपर मलेनेसे तीव्रज्वर और दाह दूर होती है ॥ १६ ॥ ज्वरनाशक धूप । पलोन्मितं निम्बपटोलपत्रं कुष्ठं वचागुग्गुलुसर्षपानाम् । हरीतकीसर्पिरितं च धूपं विनाशनं वै विषमज्वराणाम् १७ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे परिशिष्टभागः समाप्तः ।
( ५५६ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । निंबके पत्र, पटोलपत्र, कूठ, वच, गूगल, पीली सरसों, हरड़का छिलका इन सबको पीसकर घी मिलाकर धूप देनेसे विषम ज्वर दूर होता है ॥ १७ ॥ इति पटियालाराज्यस्थवैद्यरत्नपं० रामप्रसादराजवैद्यवैद्योपाध्यायकृतभाषा- टीकायां परिशिष्टभागः समाप्तः ॥ ऊनविंशशते वर्षे सप्तत्या ह्यधिके शुभे । पौषशुक्लदशम्यां वै टीका पूर्तिमागादियम् ॥ सेयं रामप्रसादेन कृता लोकहितेच्छुना । कृपया शोधनीयं तत् त्रुटितं चात्र यत्क्वचित् ॥ ⸱ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।
पुस्तकें मिलने के स्थान १) खेमराज श्रीकृष्णदास, ३) गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, व बुक डिपो, खेतवाडी, मुंबई - ४०० ००४. अहिल्याबाई चौक, कल्याण २) खेमराज श्रीकृष्णदास, (जि. ठाणे - महाराष्ट्र) ६६, हडपसर इण्डस्ट्रिअल इस्टेट ४) खेमराज श्रीकृष्णदास, पुणे - ४११०१३. चौक - वाराणसी (उ.प्र.)
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खेमश्री खेमराज श्रीकृष्णदास खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई