भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ५५२ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । उपलोंके पर्याय नाम । पिष्टकं छगणं छाणमुत्पलं चोपलं तथा । गिरिण्डोपलसाठी च वराटी छगणाह्वयम् ॥ २० ॥ पिष्टक, छगण, छाण, उत्पल, उपल, गिरिण्ड, उत्पलसाठी और वराटी यह सब नाम सूखी हुई गोबरी कंडोंके हैं ॥ २० ॥ इति पुटविधान । अथ अञ्जनविधान । निम्बबीजं शिलाजाजीधूमसारं समांशकम् । कारवेल्लरसैर्भाव्यमेकविंशतिवारकम् ॥ १ ॥ यत्पार्श्वतोऽञ्जिते नेत्रे तत्पार्श्वञ्च ज्वरं जयेत् । अर्द्धनारीश्वरो नाम रसकौतुककारकम् ॥ २ ॥ १—नीमकी गिरी, मैनशिल, जीरा और धूमसार ( गृहधूम ) इन सबको पीसकर करेलेके रसमें २१ बार भावना देवे फिर मटरके समान बत्ती बनाकर रक्खे, इस बत्तीको ( स्त्रीके दूध या पानी ) में घिसकर जिस नेत्रमें आंजे उस भागके आधे शरीरका ज्वर उतर जाता है ( दूसरे नेत्रमें आंजनेसे सब ज्वर उतर जाता है ), इस कौतुक करने- वाले रसका नाम अर्द्धनारीनटेश्वर है ॥ १ ॥ २ ॥ ऊर्णाया नाभिजालेन वर्त्तिं कृत्वा प्रयत्नतः । ज्वालयेत्तिलतैलेन कज्जलं प्रहरेच्छनैः । अञ्जयेन्नेत्रयुगलं द्व्याहिकं तु ज्वरं जयेत् ॥ ३ ॥ २—मकड़ीके जालेकी बत्ती बनाकर तिलोंके तेलमें भिगोकर युक्तिसे जलावे, इसकी लोइ ( स्याही ) को यत्नपूर्वक उतार ले, इसको दोनों नेत्रोंमें आंजनेसे तृतीयकज्वर दूर होता है ॥ ३ ॥