रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 577, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५५१) ९-भूधर पुट । वह्निमित्रां क्षितौ सम्यङ्निखन्याद्व्यङ्गुलादधः । उपरिष्टात्पुटं यत्र पुटं तद्भूधराह्वयम् ॥ १७ ॥ प्रथम पृथिवीमें एक हाथ ( मुकस्सर ) गहरा और चारों ओरसे एकसा गजपुटके गढ़े समान गढ़ा बना ले, उस गढेके भीतर मध्यमें एक और दो अंगुल या चार अथवा छः अंगुलका गढा खोद ले, उसमें औषधीका संपुट रख ऊपरसे मट्टी डालकर दबाकर बंद करदे, फिर उसमें जंगली उपले डालकर अग्नि लगा दे; स्वांगशीतल होनेपर औषधि निकाल ले, इसे भूधरपुट कहते हैं । कोई ऐसा मानते हैं कि साफ भूमिमें दो या चार अंगुलका गढा खोदकर उसमें औषधीका संपुट रख ऊपरसे थोडेसे उपलोंकी पुट देवे इसको भूधरपुट कहते हैं॥१७॥ १०-लावपुट । ऊर्ध्वं षोडशिकामात्रैस्तुषैर्वा गोवरैः पुटम् । यत्र तल्लावकाख्यं स्यात्सुमृदुद्रव्यसाधने ॥ १८ ॥ ( यदि अत्यंत मृदु द्रव्यको अति मृदु अग्नि देनी हो तो ) एक पात्रमें द्रव्यको रखकर उस पात्रमें तुष अथवा गोबरके दो तोले चूर्ण डाल अग्नि लगा दे, शीतल होनेपर द्रव्य निकाल ले, इसको लावपुट कहते हैं ॥ १८ ॥ अनुक्तपुटमाने तु साध्यद्रव्यबलाबलम् । पुटं विज्ञाय दातव्यमूहापोहविचक्षणैः ॥ १९ ॥ तर्क वितर्क द्वारा गहरे विचारको समझनेवाले वैद्यको चाहिये कि जिस द्रव्यके मारणमें पुटका नाम नहीं लिखा उस स्थानमें द्रव्यके कठोर या मृदु आदि बलाबलको विचार कर कठोर ( देरमें भस्म होने- वाले ) द्रव्यको महापुट या गजपुटमें फूंके । मृदु द्रव्यको कुक्कुटादि पुट देना चाहिये ॥ १९ ॥