भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ५५० ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । क्रमसे उपलोंके टुकड़े लगाकर अग्नि दे, इसको कपोतपुट कहते हैं । यह पारद भस्म करनेके लिये कही है ॥ १२ ॥ ६-गोवर पुट । गोष्ठांतर्गोखुरक्षुण्णं शुष्कं चूर्णितगोमयम् । गोवरं तत्समाख्यातं वरिष्ठं रससाधने ॥ १३ ॥ गोवरैर्वा तुषैर्वापि पुटं यत्र प्रदीयते । तद्गोवरपुटं प्रोक्तं सिद्धये रसभस्मनः ॥ १४ ॥ जिस स्थानमें गौवोंका गोमय गौवोंके खुरोंसे कुचला गया हो वह सूखा गोमय लेकर चूर्ण करले ( अथवा साधारण गोमय सुखा- कर चूर्ण करले ) इस चूर्णको गोवर कहते हैं, यह गोबर पारेके साधनमें अतिश्रेष्ठ मानागया है । इस गोबरके चूर्णमें औषधिका संपुट रख पुट देनेको गोबरपुट कहते हैं, अथवा तुषोंमें पुट देना भी गोबर पुट कहा जाता है ॥ १३ ॥ १४ ॥ ७-भाण्ड पुट । स्थूलभाण्डे तुषापूर्णे मध्ये मूषासमन्विते । वह्निना विहिते पाके तद्भाण्डपुटमुच्यते ॥ १५ ॥ एक बड़े पात्रमें तुषभर कर उन तुषोंके मध्यमें मूषा ( या संपुट ) रख ऊपर तुषोंसे भरकर हाथसे खूब दबा दे; फिर इस पात्रको चूल्हे- पर चढ़ा नीचे अग्नि जलावे, इसको भाण्डपुट कहते हैं ॥ १५ ॥ ८-वालुका पुट । अधस्तादुपरिष्टाच्च क्रौञ्चिकाऽऽच्छद्यते खलु । वालुकाभिः प्रतप्ताभिर्यन्त्र तद्वालुकापुटम् ॥१६॥ एक बड़े पात्रमें आधा वालु रेत भरकर उसमें औषधिका सम्पुट रख ऊपरसे और वालु रेत डालकर भर दे, फिर इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा नीचे तीक्ष्णाग्नि जलावे । अग्निके तापसे वालूकी गर्माईमें औषधि पकनेको वालुकापुट कहते हैं ॥ १६ ॥