रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५४९ ) पूर्वाच्छगणतोऽर्धानि गिरिण्डानि विनिःक्षिपेत् । एतद्गजपुटं प्रोक्तं महागुणविधायकम् ॥ ९ ॥ सवा हाथ गहरा, सवा हाथ चारों ओरसे लंबा चौड़ा, ऐसा एक गढ़ा खोदकर उसमें आधे भाग पर्यन्त जंगली उपले भरे, फिर जिस द्रव्यको पुट देना हो उस द्रव्यसे भरी हुई मूषा ( विधिवत् संपुट किये शराव संपुट या गोले आदिको भी ) ठीक मध्यमें रख शेष आधे उपले उसके ऊपर भरकर अग्नि देवे, इसको गजपुट कहते हैं, यह द्रव्यमें अतीव गुण उत्पन्न करनेवाली है ॥ ७-९ ॥ ३-वाराहपुट । इत्थं चारत्निके कुण्डे पुटं वाराहमुच्यते ॥ १० ॥ एकहाथ ( मुष्टिबद्धहस्त ) गहरा लंबा चौड़ा गढा खोदकर उसमें गजपुटके विधानसे पुट देनेको वाराहपुट कहते हैं ॥ १० ॥ ४-कुक्कुट पुट । पुटं भूमितले यत्तद्वितस्तिद्वितयोच्छ्रयम् । तावच्च तलविस्तीर्णं तत्स्यात्कुक्कुटकं पुटम् ॥ ११ ॥ जो गढ़ा दो बालिस्त गहरा, लम्बा, चौड़ा हो उसमें जंगली उपलोंसे पुट देनेको कुक्कुट पुट कहते हैं ॥ ११ ॥ ५-कपोत पुट । यत्पुटं दीयते भूमावष्टसंख्यैर्वनोपलैः । बद्धा सूतकभस्मार्थं कपोतपुटमुच्यते ॥ १२ ॥ विना गढ़ा खोदे ही साफ भूमिपर आठ उपलोंके छोटे छोटे टुकड़े कर उनकी विधिवत् आवाँसी लगावे, बीचमें पारेकी गोली आदिको तांबेके संपुट या अन्य संपुटमें विधिवत् रख संपुट कर रख दे, फिर १ ग्रन्थान्तरमें " वितस्तिमात्रे गर्ते यत्पुटयेत्तत्तु कौक्कुटम्" एक बालिस्त गहरा चौड़ा विस्तारके गढ़ेमें जो पुट दीजाय उसको कुक्कुट पुट कहते हैं।