भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ५४८ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । होजाते हैं । जैसे पत्थरको आगमें रख देनेसे बाहरकी अग्नि पत्थरके भीतर प्रवेश कर जाती है उसी प्रकार पुटद्वारा भस्म किये जानेसे लोहादि भस्ममें अनेक गुण आजाते हैं, इसलिये पुटविधानसे ही धातुआदिकोंकी भस्म करनी चाहिये ॥ १-४ ॥ १-महापुट । निम्ने विस्तरतः कुण्डे द्विहस्ते चतुरस्रके । वनोत्पलसहस्रेण पूरिते पुटनौषधम् ॥ ५ ॥ क्रौञ्च्यां रुद्धं प्रयत्नेन पिष्टिकोपरि विन्यसेत् । वनोत्पलसहस्रार्द्धं क्रौंचिकोपरि निक्षिपेत् ॥ वह्निं प्रज्वालयेत्तत्र महापुटमिदं स्मृतम् ॥ ६ ॥ दो हाथ गहरा दो हाथ लम्बा चौड़ा चौरस गढ़ा खोदकर साफ़ करे, उसमें एक सहस्र जंगली उपले भरकर लोहादि द्रव्यको पुट देवे । पुट देनेका क्रम यह है कि पहले इस गढ़ेमें पांचसौ ( आधे ) जंगली उपले डालकर आधे भाग तक भरदेवे । फिर जिस द्रव्यको पुट देना हो उसको मूषामें रख दूसरी मूषासे बन्द कर कपड़मिट्टी- करके सुखाया हुआ सम्पुट उस आधे भागतक भरे हुए गढ़ेमें उपलोंके ऊपर मध्यमें रखदेवे, इस सम्पुट के ऊपर बाकी आधे जंगली उपले भरकर अग्नि लगादेवे, ( स्वांग शीतल होनेपर उस संपुटको निकाल उसमेंसे औषधि निकाल ले ) इसको महापुट कहते हैं, ( यदि उपले सहस्रसे न्यून या अधिक डालनेसे यह गढ़ा भरे तो उपरोक्त संख्याकी आवश्यकता नहीं ) ॥ ५ ॥ ६ ॥ २-गजपुट । राजहस्तप्रमाणेन चतुरस्रं च निम्नकम् ॥ ७ ॥ पूर्णं चोपलसाठीभिः कंठावध्यथ विन्यसेत् । विन्यसेत्कुमुदीं तत्र पुटनद्रव्यपूरिताम् ॥ ८ ॥