भारतकोश
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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ५४८ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । होजाते हैं । जैसे पत्थरको आगमें रख देनेसे बाहरकी अग्नि पत्थरके भीतर प्रवेश कर जाती है उसी प्रकार पुटद्वारा भस्म किये जानेसे लोहादि भस्ममें अनेक गुण आजाते हैं, इसलिये पुटविधानसे ही धातुआदिकोंकी भस्म करनी चाहिये ॥ १-४ ॥ १-महापुट । निम्ने विस्तरतः कुण्डे द्विहस्ते चतुरस्रके । वनोत्पलसहस्रेण पूरिते पुटनौषधम् ॥ ५ ॥ क्रौञ्च्यां रुद्धं प्रयत्नेन पिष्टिकोपरि विन्यसेत् । वनोत्पलसहस्रार्द्धं क्रौंचिकोपरि निक्षिपेत् ॥ वह्निं प्रज्वालयेत्तत्र महापुटमिदं स्मृतम् ॥ ६ ॥ दो हाथ गहरा दो हाथ लम्बा चौड़ा चौरस गढ़ा खोदकर साफ़ करे, उसमें एक सहस्र जंगली उपले भरकर लोहादि द्रव्यको पुट देवे । पुट देनेका क्रम यह है कि पहले इस गढ़ेमें पांचसौ ( आधे ) जंगली उपले डालकर आधे भाग तक भरदेवे । फिर जिस द्रव्यको पुट देना हो उसको मूषामें रख दूसरी मूषासे बन्द कर कपड़मिट्टी- करके सुखाया हुआ सम्पुट उस आधे भागतक भरे हुए गढ़ेमें उपलोंके ऊपर मध्यमें रखदेवे, इस सम्पुट के ऊपर बाकी आधे जंगली उपले भरकर अग्नि लगादेवे, ( स्वांग शीतल होनेपर उस संपुटको निकाल उसमेंसे औषधि निकाल ले ) इसको महापुट कहते हैं, ( यदि उपले सहस्रसे न्यून या अधिक डालनेसे यह गढ़ा भरे तो उपरोक्त संख्याकी आवश्यकता नहीं ) ॥ ५ ॥ ६ ॥ २-गजपुट । राजहस्तप्रमाणेन चतुरस्रं च निम्नकम् ॥ ७ ॥ पूर्णं चोपलसाठीभिः कंठावध्यथ विन्यसेत् । विन्यसेत्कुमुदीं तत्र पुटनद्रव्यपूरिताम् ॥ ८ ॥

भाषाटीकासहित । ( ५४९ ) पूर्वाच्छगणतोऽर्धानि गिरिण्डानि विनिःक्षिपेत् । एतद्गजपुटं प्रोक्तं महागुणविधायकम् ॥ ९ ॥ सवा हाथ गहरा, सवा हाथ चारों ओरसे लंबा चौड़ा, ऐसा एक गढ़ा खोदकर उसमें आधे भाग पर्यन्त जंगली उपले भरे, फिर जिस द्रव्यको पुट देना हो उस द्रव्यसे भरी हुई मूषा ( विधिवत् संपुट किये शराव संपुट या गोले आदिको भी ) ठीक मध्यमें रख शेष आधे उपले उसके ऊपर भरकर अग्नि देवे, इसको गजपुट कहते हैं, यह द्रव्यमें अतीव गुण उत्पन्न करनेवाली है ॥ ७-९ ॥ ३-वाराहपुट । इत्थं चारत्निके कुण्डे पुटं वाराहमुच्यते ॥ १० ॥ एकहाथ ( मुष्टिबद्धहस्त ) गहरा लंबा चौड़ा गढा खोदकर उसमें गजपुटके विधानसे पुट देनेको वाराहपुट कहते हैं ॥ १० ॥ ४-कुक्कुट पुट । पुटं भूमितले यत्तद्वितस्तिद्वितयोच्छ्रयम् । तावच्च तलविस्तीर्णं तत्स्यात्कुक्कुटकं पुटम् ॥ ११ ॥ जो गढ़ा दो बालिस्त गहरा, लम्बा, चौड़ा हो उसमें जंगली उपलोंसे पुट देनेको कुक्कुट पुट कहते हैं ॥ ११ ॥ ५-कपोत पुट । यत्पुटं दीयते भूमावष्टसंख्यैर्वनोपलैः । बद्धा सूतकभस्मार्थं कपोतपुटमुच्यते ॥ १२ ॥ विना गढ़ा खोदे ही साफ भूमिपर आठ उपलोंके छोटे छोटे टुकड़े कर उनकी विधिवत् आवाँसी लगावे, बीचमें पारेकी गोली आदिको तांबेके संपुट या अन्य संपुटमें विधिवत् रख संपुट कर रख दे, फिर १ ग्रन्थान्तरमें " वितस्तिमात्रे गर्ते यत्पुटयेत्तत्तु कौक्कुटम्" एक बालिस्त गहरा चौड़ा विस्तारके गढ़ेमें जो पुट दीजाय उसको कुक्कुट पुट कहते हैं।

( ५५० ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । क्रमसे उपलोंके टुकड़े लगाकर अग्नि दे, इसको कपोतपुट कहते हैं । यह पारद भस्म करनेके लिये कही है ॥ १२ ॥ ६-गोवर पुट । गोष्ठांतर्गोखुरक्षुण्णं शुष्कं चूर्णितगोमयम् । गोवरं तत्समाख्यातं वरिष्ठं रससाधने ॥ १३ ॥ गोवरैर्वा तुषैर्वापि पुटं यत्र प्रदीयते । तद्गोवरपुटं प्रोक्तं सिद्धये रसभस्मनः ॥ १४ ॥ जिस स्थानमें गौवोंका गोमय गौवोंके खुरोंसे कुचला गया हो वह सूखा गोमय लेकर चूर्ण करले ( अथवा साधारण गोमय सुखा- कर चूर्ण करले ) इस चूर्णको गोवर कहते हैं, यह गोबर पारेके साधनमें अतिश्रेष्ठ मानागया है । इस गोबरके चूर्णमें औषधिका संपुट रख पुट देनेको गोबरपुट कहते हैं, अथवा तुषोंमें पुट देना भी गोबर पुट कहा जाता है ॥ १३ ॥ १४ ॥ ७-भाण्ड पुट । स्थूलभाण्डे तुषापूर्णे मध्ये मूषासमन्विते । वह्निना विहिते पाके तद्भाण्डपुटमुच्यते ॥ १५ ॥ एक बड़े पात्रमें तुषभर कर उन तुषोंके मध्यमें मूषा ( या संपुट ) रख ऊपर तुषोंसे भरकर हाथसे खूब दबा दे; फिर इस पात्रको चूल्हे- पर चढ़ा नीचे अग्नि जलावे, इसको भाण्डपुट कहते हैं ॥ १५ ॥ ८-वालुका पुट । अधस्तादुपरिष्टाच्च क्रौञ्चिकाऽऽच्छद्यते खलु । वालुकाभिः प्रतप्ताभिर्यन्त्र तद्वालुकापुटम् ॥१६॥ एक बड़े पात्रमें आधा वालु रेत भरकर उसमें औषधिका सम्पुट रख ऊपरसे और वालु रेत डालकर भर दे, फिर इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा नीचे तीक्ष्णाग्नि जलावे । अग्निके तापसे वालूकी गर्माईमें औषधि पकनेको वालुकापुट कहते हैं ॥ १६ ॥

भाषाटीकासहित । ( ५५१) ९-भूधर पुट । वह्निमित्रां क्षितौ सम्यङ्निखन्याद्व्यङ्गुलादधः । उपरिष्टात्पुटं यत्र पुटं तद्भूधराह्वयम् ॥ १७ ॥ प्रथम पृथिवीमें एक हाथ ( मुकस्सर ) गहरा और चारों ओरसे एकसा गजपुटके गढ़े समान गढ़ा बना ले, उस गढेके भीतर मध्यमें एक और दो अंगुल या चार अथवा छः अंगुलका गढा खोद ले, उसमें औषधीका संपुट रख ऊपरसे मट्टी डालकर दबाकर बंद करदे, फिर उसमें जंगली उपले डालकर अग्नि लगा दे; स्वांगशीतल होनेपर औषधि निकाल ले, इसे भूधरपुट कहते हैं । कोई ऐसा मानते हैं कि साफ भूमिमें दो या चार अंगुलका गढा खोदकर उसमें औषधीका संपुट रख ऊपरसे थोडेसे उपलोंकी पुट देवे इसको भूधरपुट कहते हैं॥१७॥ १०-लावपुट । ऊर्ध्वं षोडशिकामात्रैस्तुषैर्वा गोवरैः पुटम् । यत्र तल्लावकाख्यं स्यात्सुमृदुद्रव्यसाधने ॥ १८ ॥ ( यदि अत्यंत मृदु द्रव्यको अति मृदु अग्नि देनी हो तो ) एक पात्रमें द्रव्यको रखकर उस पात्रमें तुष अथवा गोबरके दो तोले चूर्ण डाल अग्नि लगा दे, शीतल होनेपर द्रव्य निकाल ले, इसको लावपुट कहते हैं ॥ १८ ॥ अनुक्तपुटमाने तु साध्यद्रव्यबलाबलम् । पुटं विज्ञाय दातव्यमूहापोहविचक्षणैः ॥ १९ ॥ तर्क वितर्क द्वारा गहरे विचारको समझनेवाले वैद्यको चाहिये कि जिस द्रव्यके मारणमें पुटका नाम नहीं लिखा उस स्थानमें द्रव्यके कठोर या मृदु आदि बलाबलको विचार कर कठोर ( देरमें भस्म होने- वाले ) द्रव्यको महापुट या गजपुटमें फूंके । मृदु द्रव्यको कुक्कुटादि पुट देना चाहिये ॥ १९ ॥

( ५५२ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । उपलोंके पर्याय नाम । पिष्टकं छगणं छाणमुत्पलं चोपलं तथा । गिरिण्डोपलसाठी च वराटी छगणाह्वयम् ॥ २० ॥ पिष्टक, छगण, छाण, उत्पल, उपल, गिरिण्ड, उत्पलसाठी और वराटी यह सब नाम सूखी हुई गोबरी कंडोंके हैं ॥ २० ॥ इति पुटविधान । अथ अञ्जनविधान । निम्बबीजं शिलाजाजीधूमसारं समांशकम् । कारवेल्लरसैर्भाव्यमेकविंशतिवारकम् ॥ १ ॥ यत्पार्श्वतोऽञ्जिते नेत्रे तत्पार्श्वञ्च ज्वरं जयेत् । अर्द्धनारीश्वरो नाम रसकौतुककारकम् ॥ २ ॥ १—नीमकी गिरी, मैनशिल, जीरा और धूमसार ( गृहधूम ) इन सबको पीसकर करेलेके रसमें २१ बार भावना देवे फिर मटरके समान बत्ती बनाकर रक्खे, इस बत्तीको ( स्त्रीके दूध या पानी ) में घिसकर जिस नेत्रमें आंजे उस भागके आधे शरीरका ज्वर उतर जाता है ( दूसरे नेत्रमें आंजनेसे सब ज्वर उतर जाता है ), इस कौतुक करने- वाले रसका नाम अर्द्धनारीनटेश्वर है ॥ १ ॥ २ ॥ ऊर्णाया नाभिजालेन वर्त्तिं कृत्वा प्रयत्नतः । ज्वालयेत्तिलतैलेन कज्जलं प्रहरेच्छनैः । अञ्जयेन्नेत्रयुगलं द्व्याहिकं तु ज्वरं जयेत् ॥ ३ ॥ २—मकड़ीके जालेकी बत्ती बनाकर तिलोंके तेलमें भिगोकर युक्तिसे जलावे, इसकी लोइ ( स्याही ) को यत्नपूर्वक उतार ले, इसको दोनों नेत्रोंमें आंजनेसे तृतीयकज्वर दूर होता है ॥ ३ ॥

भाषाटीकासहित । ( ५५३ ) व्योषञ्च त्रिफलामृतं लौहं वङ्गञ्च ताम्रकम् । पुत्रमातृपयश्चैव कारयेद्वटिकां बुधैः ॥ ४ ॥ दुग्धेन चाञ्जनं कृत्वा एकाङ्गज्वरनाशनम् । द्वितीये चाञ्जनं कृत्वा सर्वांगज्वरनाशनम् ॥ ५ ॥ ३-त्रिकुटा, त्रिफला, मृत पारद, लोहभस्म, वंगभस्म और ताम्र- भस्म इन सबको बांझककौडेकी जड़के रसमें अथवा स्त्रीके दूधमें खरल कर गोली बना ले । इस गोलीको स्त्रीके दूधमें घिसकर एक नेत्रमें अञ्जन करनेसे आधे शरीरका ज्वर नष्ट हो जाता है; दूसरे नेत्रमें आँजनेसे सारे शरीरका ज्वर दूर होता है ॥ ४ ॥ ५ ॥ रसगन्धं शिलातुत्थं तालकं मृतटङ्कणम् । नवसादरकर्षैकमर्कदुग्धेन मर्दयेत् ॥ ६ ॥ चुल्लिकायामथारोप्य पचेद्यामचतुर्दश । स्वांगशीतलमादाय खल्ले तं कज्जलीकृतम् ॥ ७ ॥ अञ्जनं वामनेत्रस्य दक्षिणे कौतुकं भवेत् । दक्षिणे चाञ्जनञ्चैव आरोग्यं भवति क्षणात् ॥ ८ ॥ ४-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, मैनाशिल, नीलाथोथा, शुद्ध हरिताल, मरा हुआ सुहागा और नौसादर इनको एक एक तोला लेकर आकके दूधमें खरल करे, फिर इसको संपुटमें रख एक हांडीमें वह सम्पुट रख दे । फिर उस हांडीको वालुरेतसे भर चूल्हेपर चढ़ावे और चौदह पहरतक नीचे अग्नि जलावे । फिर स्वांगशीतल होनेपर खरलमें डाल पीसकर कज्जली बनावे । यदि इस अञ्जनको वाम नेत्रमें डाले तो दहनी ओर आधे शरीरका ज्वर दूर होता है और दहने नेत्रमें डाले तो सब शरीरका ज्वर उतर जाता है ॥ ६-८ ॥

( ५५४ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । ज्वरनाशक नस्य । शुद्धतुत्थं पलैकं च भावयेज्जालिनीरसैः । सप्तविंशतिवारांश्च निम्बूनीरे तथैव च ॥ ९ ॥ शुष्कंनस्यं प्रदातव्यं सर्वज्वरविनाशनम् । यस्मिन्नासापुटे दत्तं ह्यर्द्धाङ्गज्वरनाशनम् ॥१०॥ शुद्ध तूतियेको कड़वी तोरीके रसमें सत्ताईस २७ बार भावना देवे, फिर नींबूके रसमें २७ भावना देकर सुखा ले और पीसकर रखे; इसकी नस्य देनेसे सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं। कौतुक यह है जिस ओरकी नासापुटमें नस्य दे उसी ओरके आधे अंगका ज्वर दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥ अर्द्धाङ्गज्वरनाशक लेप । पौष्करं कट्फलं शुण्ठी मुस्तं जातीफलं समम् । शतपुष्पा शटी चैव छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ कोष्णं कृत्वा ततश्चार्धेज्वराणां नाशनं परम् ॥११॥ पोहकरमूल, कायफल, सोंठ, नागरमोथा, जायफल, सौंफ और कचूर इनको बकरीके दूधमें रगड़कर लेप करनेसे आधे अंगमें होनेवाला ज्वर नष्ट होता है ॥ ११ ॥ सर्वज्वरनाशक धूलन । भूनिम्बकटुकाव्योषं त्रिफलामरदारु च । प्रियंगुहिंगुमंजिष्ठाः शतपुष्पा च कारवी ॥१२॥ अजमोदाजमानी च कचूरमधुकं तथा । कुलत्थं त्रायमाणा च कट्फलातिविषा तथा ॥१३॥

भाषाटीकासहित । ( ५५५ ) चव्यं कुष्ठं दुरालंभा भार्गी रास्ना च रेणुका । सर्षपा राजिका चैव सिंधुं सर्जरसं तथा ॥ १४ ॥ समभागं विचूर्ण्यैतद्भावयेत् शिग्रुजे द्रवे । शुष्कं विचूर्ण्य तच्चूर्णमातुराङ्गे च मर्दयेत् ॥ ज्वरमष्टविधं हन्यात्सन्निपातं च दारुणम् ॥ १५ ॥ चिरायता, कटुकी, त्रिकुटा, त्रिफला, देवदारु, फूलप्रियंगु, हींग, मंजीठ, सौंफ, सोरा, अजमोद, अजवायन, कचूर, मुलेठी, कुलथी, त्रायमाण, कायफल, अतीस, चव्य, कूठ, जवासा, भारंगी, रास्ना, रेणुका, सरसों, राई, सेंधानमक, राल इन सबको सम भाग लेकर सुहांजनेके रसमें भावना दे, सूखनेपर बारीक पीसकर ज्वरवालेके शरीर- पर इस चूर्णको मर्दन करे तो आठ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके सन्निपात दूर होते हैं ॥ १२-१५ ॥ तीव्रज्वरनाशक धूलन । हरिप्रियबलभद्रामाधवीशृङ्गवेरं कवचजलजवीरं बालकं भद्रकन्दम्। दलरजसमभागं धूलनं यस्य गात्रे शमयति ज्वरतीव्रं सर्वदाहं निहन्ति ॥ १६ ॥ अगरु, त्रायमाण, सौंफ, सोंठ, भोजपत्र, कमल, पोहकरमूल, नेत्र- वाला, नागरमोथे और तेजपत्र इन सबका चूर्ण कर शरीरपर मलेनेसे तीव्रज्वर और दाह दूर होती है ॥ १६ ॥ ज्वरनाशक धूप । पलोन्मितं निम्बपटोलपत्रं कुष्ठं वचागुग्गुलुसर्षपानाम् । हरीतकीसर्पिरितं च धूपं विनाशनं वै विषमज्वराणाम् १७ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे परिशिष्टभागः समाप्तः ।

( ५५६ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । निंबके पत्र, पटोलपत्र, कूठ, वच, गूगल, पीली सरसों, हरड़का छिलका इन सबको पीसकर घी मिलाकर धूप देनेसे विषम ज्वर दूर होता है ॥ १७ ॥ इति पटियालाराज्यस्थवैद्यरत्नपं० रामप्रसादराजवैद्यवैद्योपाध्यायकृतभाषा- टीकायां परिशिष्टभागः समाप्तः ॥ ऊनविंशशते वर्षे सप्तत्या ह्यधिके शुभे । पौषशुक्लदशम्यां वै टीका पूर्तिमागादियम् ॥ सेयं रामप्रसादेन कृता लोकहितेच्छुना । कृपया शोधनीयं तत् त्रुटितं चात्र यत्क्वचित् ॥ ⸱ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।


पुस्तकें मिलने के स्थान १) खेमराज श्रीकृष्णदास, ३) गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, व बुक डिपो, खेतवाडी, मुंबई - ४०० ००४. अहिल्याबाई चौक, कल्याण २) खेमराज श्रीकृष्णदास, (जि. ठाणे - महाराष्ट्र) ६६, हडपसर इण्डस्ट्रिअल इस्टेट ४) खेमराज श्रीकृष्णदास, पुणे - ४११०१३. चौक - वाराणसी (उ.प्र.)

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खेमश्री खेमराज श्रीकृष्णदास खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई