रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरसेन्द्रसारसंग्रह परिशिष्ट भाग । पुटके गुण । रसादिद्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम् । नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः सुपाकं हितमौषधम् ॥ १ ॥ लोहादेरपुनर्भावो गुणाधिक्यं तथोग्रता । अनप्सु मज्जनं रेखापूर्णता पुटतो भवेत् ॥ २ ॥ पुटाद् ग्राव्णो लघुत्वं च शीघ्रव्याप्तिश्च दीपनम् । जारितादपि सूतेन्द्राल्लोहानामधिको गुणः ॥ ३ ॥ यथाश्मनि विशेद्वह्निर्बहिस्थपुटयोगतः । चूर्णत्वादिगुणावाप्तिस्तथा लोहेषु निश्चितम् ॥ ४ ॥ जिससे पारद आदि द्रव्योंके पाकका प्रमाण जाना जाय उसे पुट कहते हैं । क्योंकि प्रमाणसे न्यून अथवा अधिक पाक होनेसे द्रव्य ( रस धातु आदि ) का गुण नष्ट होजाता है । अच्छे प्रमाणसे पाक किया जानेसे द्रव्यमें उत्तम गुण होजाता है और प्रमाणपूर्वक पुट देनेसे ही लोहादि धातुओंकी निरुत्थ भस्म होती है । उनमें गुणोंकी उत्तम प्रकारसे अधिकता आजाती है, वह अधिक तीक्ष्ण अर्थात् तेज ( शीघ्र लाभकारी ) होजाते हैं, एवं जलपर तैरनेवाली तथा मलनेसे हाथकी रेखाओंमें भर जानेवाली उत्तम भस्म होजाती है इसलिये विधिवत् पुट देकर ही धातुओंकी भस्म बनानी चाहिये ॥ पुट देनेसे ही अत्यंत भारी द्रव्यमें हलकापन उत्पन्न होता है । एवं पुटसे ही शीघ्रव्यापित्व और दीपनादि गुण उत्पन्न होते हैं तथा जारण किये हुए पारेसे भी अधिक गुण लोहादिकोंमें उत्पन्न