रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शंख संपूर्ण रोगोंको हरनेवाला है, विशेषतासे उदर रोगोंको दूर करता है तथा शूल, अम्लपित्त, विष्टम्भ और प्रमेह इनको हरनेवाला है एवं दीपन है ( इसकी भस्मका ही प्रयोग करना चाहिये। परंतु नेत्रके फोला आदि रोगोंमें कच्चा शंख ही रगड़कर डाला जाता है ) ॥५३॥ इति उपरसशोधन समाप्त । अथ स्वर्णादिधातुशोधनमारण । सोना आदि ८ धातुओंकी साधारण शुद्धि । हेमादि लोहकिट्टान्तं शोधनं मारणं शृणु । तैले तक्रे गवां मूत्रे काञ्जिकेऽथ कुलत्थके ॥५४॥ तप्ततप्तानि सिञ्चेत तत्तद्भावे च सप्तधा । एवं स्वर्णादिलोहानि शुद्धिमायान्त्यसंशयः ॥५५॥ सुवर्णसे लेकर लोह किट्ट ( मण्डूर ) पर्यंत सब धातुओंका शोधन और मारण सुनो-सुवर्णादि धातुओंमेंसे जिसका शोधन करना हो उसको अग्निमें तपा २ कर तेल, तक्र ( मट्ठा ), गोमूत्र, कांजी और कुलथीका काय इन हरेक द्रव्यमें सात सात वार बुझावे । इस प्रकार इन पांचों ही द्रव्योंसे सात सात वार बुझानेसे सुवर्ण आदि सब धातु निश्चय ही शुद्ध होजाती हैं ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ अशुद्ध सुवर्णका दोष । सौख्यं वीर्यं बलं हन्ति नानारोगं करोति च । अशुद्धममृतं स्वर्णं तस्माच्छुद्धं तु मारयेत् ॥५६॥ अशुद्ध सुवर्ण-सौख्य, वीर्य, बल इन सबको हनन करता है तथा अनेक प्रकारके रोगोंको उत्पन्न करता है इसलिये अशुद्ध सुवर्णकी भस्म नहीं करनी चाहिये । “ अशुद्धममृतं ” इस पुस्तकमें ऐसा पाठ है इसका यह अर्थ है कि अशोधित सुवर्ण और मारणमें अधमरा