भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

भाषाटीकासहित । ( ६५ )

सुवर्ण उपरोक्त दोषोंको करता है । अन्य पुस्तकोंमें “ अशुद्धं नामृतं ” ऐसा पाठ है, उसका यह अर्थ है कि अशुभ स्वर्ण अमृतके समान गुणकारी नहीं है परन्तु यहाँ “ अशुद्धं वै मृतं स्वर्णं ” ऐसा पाठ चाहिये जिसका यह अर्थ हो सकता है कि बिना शोधन किये मारा हुआ सुवर्ण सौख्य बल वीर्यादि नाशक होता है इसलिये प्रथम सुवर्णका शोधन कर फिर भस्म करे ॥ ५६ ॥ सुवर्णशोधन । मृत्तिकामातुलुङ्गाम्लैर्भावितं पञ्चवासरम् । मृद्भस्मलपणाद्येम शोधयेत्पुटयेत्ततः ॥ ५७ ॥ आगे कही पंच मृत्तिकाके चूर्णमें बिजौरे नींबूका रस डालकर इसमें सुवर्णके पत्रोंको पांच दिन भिगोये रक्खे फिर निकाल कर पीली मिट्टी या गेरू और सेंधानमक तथा उपलोंकी भस्म इन तीनोंको पीसकर स्वर्ण पत्रोंपर लेप कर इन पत्रोंको जंगली उपलोंकी अग्निमें रख पुट देवे, इस प्रकार तीन पुट देनेसे सुवर्ण शुद्ध होजाता है ॥५७॥ [