रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सुवर्णभस्मकी विधि । माक्षिकं नागचूर्णञ्च पिष्टमर्करसेन च । हेमपत्रं पुटेनैव म्रियते क्षणमात्रतः ॥ २६० ॥ सुवर्णके शुद्ध पत्रोंपर सोनामक्खी और शीसे ( सिक्के ) को आकके दूधमें रगड़कर लेप करे फिर इनको अन्धमूषामें रख पुटमें फूंक दे तो सोनेकी भस्म होजायगी ॥ २६० ॥ सुशुद्धं पारदं दत्त्वा कुर्याद्यत्नेन पीठिकाम् । दत्त्वोर्ध्वाधो नागचूर्णं पुटेन म्रियते ध्रुवम् ॥ ६१ ॥ दूसरी विधि-शुद्ध बारीक स्वर्णपत्रोंमें ( दोगुना ) शुद्ध पारा मिला- कर दोनोंको रगड़कर पीठीसी बना ले, इसको वज्रमूषाओंके संपुटमें रख नीचे ऊपर सिक्केका चूर्ण देकर संपुटको बंदकर पुट देनेसे सुव- र्णकी एक ही पुटमें भस्म होजाती है ॥ ६१ ॥ गलितस्य सुवर्णस्य षोडशांशेन सीसकम् । योजयित्वा समुद्धृत्य निम्बुनीरेण मर्दयेत् ॥ ६२ ॥ गोलं कृत्वा गन्धचूर्णं समं दद्यात् तथोपरि । शरावसंपुटे कृत्वा पुटेत्त्रिंशद्वनोपलैः । एवं मुनिपुटैर्हेम नोत्थानं लभते पुनः ॥ ६३ ॥ तीसरी विधि-सुवर्णको मूषा ( कठाली ) में रख कोयलोंकी तीक्ष्ण अग्नि देकर गलावे जब सुवर्ण पिघल जावे तो सुवर्णसे सोलहवां भाग सिक्का मिलाकर दोनोंको उत्तम खल्वमें डाल नींबूके रससे मर्दन करे ( तीन दिन ) रगड़कर गोला बनावे इस गोलेके नीचे ऊपर सुवर्णके बराबर शुद्ध गंधकका चूर्ण देकर शरावसंपुट करे, संपुटको धूपमें सुखा- कर तीस जंगली उपलोंकी अग्निमें पुट देवे ( किसी पुस्तकमें “ घनो -