रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ८६
चित्रण किया है । ३. नायिका-भेद—प्रेम-व्यापार में नायिका को प्रमुख स्थान दिया गया है, अतः इसके भेदों के वर्णन का विधान भी सयोग शृंगार के अन्तर्गत किया जाता है। रसखान आचार्य नही, कवि हैं। अतः यह आवश्यक नही कि सभी काव्यशास्त्रीय विधान इनके काव्य मे उपलब्ध हो । जहाँ तक नायिका-भेद का प्रश्न है, इस ओर से ये प्रायः उदासीन ही रहे हैं। इस उदासीनता का कारण इनका भक्त-हृदय है। फिर भी कुछ नायिकाओ के भेद इनके काव्य मे स्वतः आ ही गये हैं । यथा— 'बाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियाँ तिरछानि तिया की । टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिया की । सोहैं तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोबन-जोति सु यौं दमकै उसकाइ दई मनोबाती दिया की ॥' इसमे मुग्धा नायिका की वय संधि का वर्णन है। और— 'जो कबहूँ मग पाँय न देत सु तो हित लालन आपुन गौनै । मेरो कह्यो करि मौन तजो कहि मोहन सो बलि बोल सलौने । सौहैं दिवावत हौ रसखानि तूं सौहै करै किन लाखनि लौने । नोखी तूं मानिनि मान कह्यो किन आन बसंत मै कीनौ है कौनै ॥' ✕ ✕ ✕ 'मान की आँधि है आधी घरी अरी जौ रसखानि डरै हित कें डर । कै हिन छोडिये परिये पाइनि ऐसे कटाछनही हियरा-हर । मोहनलाल को हाल विलोकिये नेकु कछु किनि छुवै कर सो कर । नाँ करिवे पर वारै है प्रान कहा करि हैं अब हाँ करिवे पर ॥' इन सवैयो मे मानवती नायिका का वर्णन है । 'खेलै अलीजान के गन मै उत प्रीतम प्यारे सो नेह नवीनो । बैननि बोध करै इन कौ, उत सैननि मोहन को मन लीनो । नैननि की चलित्री कछु जानि सखी रसखानि चितवै कौ कीनो । जा लखि पाइ जंभाइ गई चुटकी चटकाइ बिदा कर दीनो ॥' यहाँ क्रियाविदग्धा नायिका है । यह नायिका अपने प्रेम-व्यापारो को अपनी क्रियाओ के द्वारा छिपाने का प्रयास करती है ।