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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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८८ रसखान-ग्रन्थावली पिचकारी चलाकर तथा समस्त युवतियों को प्रेम से भिगोकर और अपनी आँखों को नचाकर मेरे सारे अंगों को नचा गया है। वह हमारी ही गली में मेरी सासु को तथा भोली ननद को नचाकर और पुराने बैरों को बदना लेकर मुझे लज्जित कर गया— 'गोकुल को ग्वाल काल्हि चौमुँह की ग्वालिन सों, चांचर रचाइ एक धूमहि मचाइगो । हियो हुलसाय रसखानि तान गाइ बांकी, सहज सुभाउ सब गांव ललचाइगो । पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह, लोचन नचाइ मेरे अंगहि नचाइगो । सासुहि नचाइ मोरी नंदहि नचाइ गोरी, बैरनि सचाइ गोरी मोहि सकुचाइगो ॥' कृष्ण पर फागलीला का इतना अधिक भूत सवार है कि वे रास्ते में आती- जाती ग्वालिनों को भी नहीं छोड़ते। इतनी जबरदस्ती से उनके मुख पर गुलाल मलते हैं कि उनकी साड़ियां भी फट जाती हैं, पर वे इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं करते। यहाँ तक कि मनचाही किये बिना वे किसी को नहीं छोड़ते। ऐसी ही एक घटना का वर्णन कोई गोपी अपनी सखी से कर रही है— 'आवत लाल गुलाल लिये मग सूने मिली इक नार नवीनी । त्यां रसखानि लगाइ हियें भटू मोज कियो मन माहि अधीनी । सारी फटी सुकुमारी हटी अंगिया दरकी सरकी रंग भीनी । गाल गुलाल लगाइ लगाइ के अंक रिझाइ विदा करिदीनी ॥' दानलीला में भी प्रेम के ये व्यापार पूर्णतया मुखरित हुए हैं। एक उदाहरण देखिए— 'छीर जो चाहत चीर गहे एजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ । दान के मिस माखन मांगत खाउ न माखन केतिक गैहौ । जानति हौं जिय की रसखानि सु काहे कौं एतिक बात बढ़ैहौ । गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्हजू नैकु न पैहौ ॥' अत हम देखते हैं कि रसखान ने प्रेम-व्यापारो का पर्याप्त और सफल