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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ८७ नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने, करिकै अचेत चेत हरिकै जतन मैं । झटपट डलट पुलट पट परिधान, जान लागी लालन पै सबै बाम वन मैं । रस रास सरस रंगीलो रसखानि प्रानि, जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन पै' । कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि जब कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई और मेरा नाम उसमे गाया तो मेरे मन पर वह जादू कर गया । नटखट, युवक और सुन्दर कृष्ण ने मुझे अचेत करके यत्नपूर्वक अपने ध्यान मे लगा लिया, अर्थात् मेरी वह अवस्था कर दी कि मै उसके बिना नही रह सकती थी । बासुरी की ध्वनि को सुनकर सारे ब्रज की स्त्रियाँ जल्दी से अपने वस्त्रो को उलटा-सीधा पहनकर बन मे पहुँच गईं । तब सुन्दर रास रचने वाले सरस और रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रास-लीला की तथा युवतियों का समूह एकत्र करके उनके साथ आनन्द मनाया । 'आज भटू मुरली-बट के तट नन्द के साँवरे रास रच्यौ री । नैननि सैननि वैननि सो नंहि कोऊ मनोहर भाव पच्यौ री । जद्यपि राखने कौ कुल-कानि सबै ब्रज-बालन आन बच्यौ री । तद्यपि वा रसखानि के हाथ बिकानी को अंत लख्यौ पै लख्यौ री ॥' अर्थात् जब कृष्ण ने मुरली-बट के नीचे रास रचा तो उन्होने प्रेम की सभी भंगिमाओ का प्रदर्शन किया, कोई भी भाव उनसे बचा न रह सका । उनकी भगिमाओ को देखकर ब्रज-बनिताएँ इतनी भाव-विभोर हुईं कि प्रयत्न करने पर भी वे अपनी कुल-मर्यादा को न बचा सकी, अर्थात् कृष्ण के वशीभूत हो ही गईं । फागलीला मे प्रेम-व्यापारो का रूप और भी अधिक स्पष्ट है । इसी लीला का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कल गोकुल का एक ग्वाला कृष्ण) चारो ओर की गोपियों को घेरकर, भाँवर रचा कर, धूम मचा गया । वह बांकी बांसुरी की तान सुनाकर तथा हृदय को उल्ल- सित करके सहज स्वभाव से सब गाँव वालो को ललचा गया है। वह अपनी