रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ रसखान-ग्रन्थावली जाता है, अर्थात् सूर्य अपनी गति भूलकर एकटक तुझे ही देखता रह जाता है। तेरा सौन्दर्य देखकर चन्द्रमा तेरे घर के आँगन मे ही ठहर जाता है और आगे नही बढता । दिन मे तो पवन चलता ही रहता है, पर रात मे भी वह दिन की आशा से तेरे पीछे लगा रहता है, अर्थात् तेरी सुगध का लोभी पवन रात-दिन तेरे इर्द-गिर्द चलता रहता है। इस पवन के रात-दिन चलते रहने के कारण तेरा तो कुछ नही बिगडता, पर बेचारे पथिक का रास्ता रुक गया है; अर्थात् पवन-वेग के कारण वह अपने माग पर नही चल पाता । २. प्रेम-व्यापार का वर्णन - जिस प्रकार रसखान ने रूप का पर्याप्त विस्तार से वर्णन किया है, उसी प्रकार प्रेम-व्यापार का भी किया है । यह व्यापार कुंजलीला, रासलीला, दानलीला और फागलीला मे विशेष रूप से मुखरित हुआ है। कोई गोपी कृष्ण से मिलकर आई है । अपनी मिलन-दशा का वर्णन वह अपनी सखी से करती है कि हे सखि । मैं आज प्रात काल जब कुंजगली से निकली तो अचानक कृष्ण से भेट हो गई । कृष्ण के मुख की मुस्कान मे मेरा मन इतना अधिक डूब गया कि वह उस मुस्कान की छवि पर से नही हटता, हटाने पर भी नही हटता । उस मुस्कान ने मेरे नैनो को बांध लिया, चित को चुरा लिया और प्रेम का गहरा फंदा डाल दिया । तुम्ही बताओ, अब मैं क्या करू ? मेरे चित्त मे बसा हुआ कृष्ण कैस बाहर निकाला जा सकता है । उस आनन्द-सागर कृष्ण के सौन्दर्य ने तो मेरे सारे शरीर को ही घेर लिया है— 'कु जगली मै अली निकसी तहाँ साँवरे ढोटा कियौ भटनेरो । माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूडि फिरै नहि फेरो । डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डार्यौ है प्रेम को फंद घनेरो । कैसी करौ अब क्यौ निकस्यो रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।' रासलीला मे प्रेम-व्यापारो का कु जलीलाओ की अपेक्षा अधिक वर्णन है । रासलीला के समय नटखट कृष्ण अपनी बाँसुरी मे जिस गोपी का नाम ले देते हैं वह तो अपना सर्वस्य भूलकर कृष्ण के ऊपर न्यौछावर ही हो जाती है— अधर लगाइ रस प्याइ बांसुरी बजाइ, मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन मैं ।