रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ८५ राधा का यह स्वाभाविक सौन्दर्य सौन्दर्य-साधक उपकरणो से विभूषित होता है तो उसकी शोभा द्विगुणित हो जानी है। उसका गहरे लाल गुलाल के समान दुकूल गुलाब के लाल फूल की भाँति शोभायमान है। उसकी काली केश-राशि भौगे के समान सुशोभित है। काले रेशम की डोरियों मे बँधे हुए गुंज पलाश-पुष्प की भाँति शोभा-सम्पन्न हैं। उसके मोती कदम्ब और आम की मं- रियो के समान शोभायमान है। उसकी वाणी मे इतना माधुर्य है कि उसके वचनो को सुनकर कोयल भी लज्जित हो जाती है— 'अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली । अलि कुंतल राजत है । मखतूल समान के गंज धरनि मै किसुक की छवि छाजत है । मुकता के कदम्ब ते अम्ब के मौर सुने सुर कोकिल लाजत है । यह श्रावनि प्यारी जु की रसखानि बसन्त-सी आज विराजत है ।" जब राधा न अपने शरीर पर चन्दन का लेप कर लिया तो वह ऐसी प्रतीत होने लगी मानो चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को लज्जित करने के लिए सब प्रकार से अपनी सात्विक शोभा को बाहर निकालकर वह सुधा की मानसपुत्री बैठी हो। उसके कुचो के बीच मे हार का चन्दा इस प्रकार सुशोभित हो रहा था जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो, अथवा वह दृग-वाणों का धाव दमक रहा हो, अथवा-श्वेत पर्वत के संधि-स्थान मे कोई जलाशय हो — 'तन चन्दन खोर के बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी, मनो इन्दुबधून लजावन कौ सब ज्ञानिन काढि धरी गन-सी । रसखानि विराजति चौकी कुचौ बिच उत्तमताहि जरी तन-सी । दमकै दृग-वान के घायन कौ गिरि सेत के संधि के जीवन-सी' । कही-कही राधा-सौन्दर्य का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन श्री रसखान ने किया है— 'वासर तूँ जु कहूँ निकरै रवि को रथ माँझ अकास अरै री । रैन महै गति है रसखानि छुपाकर आँगन तै न टरै री। द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौस की आसन पाय घरै री । तेरी न जात कछू दिन राति विचारे बटोही की बाट परै री ।' हे राधा ! यदि तू दिन मे अपने घर से बाहर निकल जाती है तो तेरे सौन्दर्य से सूर्य इतना चकित हो जाता है कि उसका रथ आकाश मे ही रुक